विदेश

102 Not Out मूवी के बीच 104 साल का खुशहाल व्‍यक्ति चाह रहा मौत

यूथेनेसिया
हाल ही में भारत में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए सशर्त पैसिव यूथेनेसिया(इच्‍छामृत्‍यु) की इजाजत दे दी है. कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि हर व्‍यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है. इस संदर्भ में यह जानना बेहद जरूरी है कि पैसिव यूथेनेसिया आखिर क्‍या है? ऑक्‍सफोर्ड इंग्लिश डिक्‍शनरी के मुताबिक जब कोई व्‍यक्ति असाध्‍य बीमारी से ग्रस्‍त हो जाता है और उसकी पीड़ा असहनीय होती है या वह ऐसे कोमा में होता है, जहां से उसके उबरने के चांस नहीं होते तो उसकी मृत्‍यु की चाह को पूरा करना यूथेनेसिया की श्रेणी में परिभाषित किया जा सकता है. 17वीं सदी में इस मेडिकल दशा को फ्रांसिस बेकन ने ‘यूथेनेसिया’ नाम दिया. उन्‍होंने इसको पीड़ा रहित सुखद मृत्‍यु कहा.

प्रकार
एक्टिव यूथेनेसिया
बायोएथिक्‍स के क्षेत्र में इस विषय पर इस वक्‍त सबसे ज्‍यादा चर्चा हो रही है. वैसे इस संबंध में विभिन्‍न देशों में अलग-अलग कानून हैं. यूथेनेसिया को भी एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया में विभाजित किया जा सकता है. एक्टिव(सक्रिय) यूथेनेसिया के तहत मेडिकल पेशेवर या कोई अन्‍य व्‍यक्ति जानबूझकर ऐसा काम करता है, जिससे रोगी की मृत्‍यु हो जाती है.

नैतिकता का तकाजा
दरअसल एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया पर लंबी बहस चल रही है. कई लोगों का यह तर्क है कि इलाज रोककर रोगी को मरने की इजाजत देना नैतिक रूप से सही है. ऐसे लोगों का यह भी तर्क है कि जानबूझकर किसी को मारना नैतिक रूप से गलत है. हालांकि कुछ लोग इसकी आलोचना करते हैं कि वास्‍तव में एक्टिव और पैसिव यूथेनेसिया एक ही बात है. ये कहते हैं कि रोगी का जरूरी इलाज नहीं करना या जानबूझकर इलाज रोक देने में कोई अंतर नहीं है.

देशों में प्रावधान
अलग-अलग देशों में इस संबंध में अलग-अलग प्रावधान हैं. बेल्जियम, कनाडा और स्विट्जरलैंड जैसे चुनिंदा देशों में ही एक्टिव यूथेनेसिया को विशेष श्रेणी में अनुमति है. इसके लिए कई शर्तें लगाई गई हैं. बेल्जियम में यह व्‍यवस्‍था है कि रोगी के आग्रह पर डॉक्‍टर उसके जीवन को समाप्‍त कर सकते हैं. लेकिन अधिकांश देशों में कई शर्तों के साथ पैसिव यूथेनेसिया की ही अनुमति है.

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