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भांग से बनायीं जा रही इन गंभीर रोगो की दवा।

दिल्ली. वैज्ञानिक एवं औद्यौगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने भांग से कैंसर, मिर्गी और स्किल सेल रोग के उपचार की तीन दवाएं विकसित की हैं। इन दवाओं के पशुओं पर परीक्षण शुरू कर दिए गए हैं तथा मानव परीक्षण के लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल से अनुमति मांगी गई हैं। तीनों दवाओं को अमेरिका में विकसित दवाओं की तर्ज पर भारतीय जरूरतों के हिसाब से विकसित किया गया है। अमेरिका में तीनों बीमारियों की भांग से बनी ऐसी दवाओं को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है।

सीएसआईआर की तरफ से भांग से दवा निर्माण को लेकर पहली बार विभिन्न पक्षों के साथ उच्चस्तरीय विचार-विमर्श किया गया। बैठक के दौरान की जम्मू स्थित प्रयोगशाला इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंट्रीग्रेटिव मेडिसिन (आईआईआईएम) के निदेशक डॉ. राम विश्वकर्मा ने ‘हिन्दुस्तान’ को विशेष बातचीत में बताया कि उनकी प्रयोगशाला ने उपरोक्त तीन दवाएं विकसित कर ली हैं। प्रयोगशाला में इनके पशुओं पर परीक्षण चल रहे हैं। अब हमने मनुष्य पर परीक्षण के लिए दवा नियंत्रक से अनुमति मांगी है। उनकी प्रयोगशाला ने जम्मू-कश्मीर सरकार से भांग से दवा निर्माण के लिए विशेष लाइसेंस लिया हुआ है।

दरअसल, नारकोटिक्स के तहत आने के कारण शोध के लिए भी भांग उपलब्ध नहीं होती है। उन्होंने कहा कि भांग में मौजूद एक तत्व सीबीडी (कैनाबिडिओल) से यह दवाएं बनाई जा रही हैं। लैब ने भांग की एक ऐसी प्रजाति ढूंढ निकाली है, जिसमें सीवीडी 4-6 फीसदी तक है। यह अच्छी मात्रा है, क्योंकि बाकी प्रजातियों में इसकी मात्रा काफी कम होती है। एक बात और इस प्रजाति के भांग के पौंधे में चरस की मात्रा काफी कम होती है। इसलिए भविष्य में इस प्रजाति की खेती किसानों के लिए भी एक अच्छा अवसर होगी।

सीएसआईआर द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री जितेन्द्र सिंह भी शामिल हुए। उन्होंने कहा कि भांग के चिकित्सकीय उपयोग को देखते हुए सरकार सभी विकल्प खुले रखेगी। बैठक में सीएसआईआर, एम्स, टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च संस्थान आदि के वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया, जिसमें भांग के चिकित्सकीय शोध को बढ़ाने पर जोर दिया गया।

डॉ. राम विश्वकर्मा ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ये दवाएं दो सालों के भीतर लोगों को उपलब्ध हो सकेंगी। इन दवाओं को बायोइक्वेंस श्रेणी में बनाया जाएगा। इसमें यह साबित करना होता है कि इन दवाओं का प्रभाव वैसा ही जैसा अमेरिका में स्वीकृत ऐसी ही दवाओं का है। यदि शोधकर्ता यह साबित कर पाते हैं तो सीमित परीक्षणों के बाद उन्हें ड्रग कंट्रोलर सीधे इसे बाजार में लाने की अनुमति दे सकता है।

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