सम्पादकीय

असुरक्षा बोध और आपराधिक न्याय

क्षमा शर्मा
पिछले दिनों बच्चा चोरी और बच्चा उठाने की अफवाहें लगातार फैलती रही हैं। एक जगह से होते हुए अब ये पूरे देश में जा पहुंची हैं। हर रोज ऐसी खबरें आ रही हैं कि लोग किसी को भी बच्चा चोर समझकर पकड़ रहे हैं, पीट रहे हैं। उदाहरण के तौर पर एक औरत अपने पोते को लेकर जा रही थी। दादी सांवली थी और पोता गोरा। बस फिर क्या था, भीड़ ने शक के आधार पर औरत को पकड़ लिया और पीटा।
शक की वजह भी अद्भुत। दादी काली है तो पोता गोरा कैसे हो सकता है। एक बच्चे में अपनी सात पीढिय़ों के जींस सक्रिय हो सकते हैं। क्या इस महिला के प्रति अपराध करने वालों को इस बच्चे की सातों पीढिय़ों की जानकारी थी कि इसके वंश में कौन गोरा था, कौन काला। फिर यह तर्क का कौन सा तरीका है कि दादी अगर सांवली या काली है तो उसका पोता भी वैसा ही होना चाहिए। इसी तरह एक आदमी अपने बच्चे को कार में ले जा रहा था, उसे भीड़ ने घेर लिया। एक महिला अपनी बच्ची के साथ जा रही थी, बच्ची रो रही थी। रोती बच्ची को देखकर महिला को बच्चा चोर समझ लिया गया।
ऐसे मारपीट करने वाले अपराधियों को मनुष्य के सामान्य व्यवहार की कितनी कम जानकारी है। क्या माता-पिता के साथ या पास जो बच्चे होते हैं, वे रोते नहीं। किसी भी चीज को लेने की अगर जिद करनी हो, कोई इच्छा पूरी नहीं हुई, उनके साथ कोई जोर जबरदस्ती हुई तो बच्चे रोकर ही अपना प्रतिरोध दर्ज कराते हैं। यह देखना भी दिलचस्प है कि जो मां बच्चे को मारती है, बच्चा रोते हुए उसकी तरफ ही दौड़ता है। इस उदाहरण का अर्थ यह कतई नहीं है कि माताएं अपने बच्चों को पीटना शुरू कर दें।
बच्चा चोरी के शक में सडक़ों पर होने वाले अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसी घटनाएं लगातार पूरे देश में हो रही हैं। इन दिनों एक जगह की अफवाह एक ही जगह नहीं रहती। पल ही पल में तकनीक उसे एक जगह से दूसरी जगह और पूरे देश में फैला देती है। कई बार इन घटनाओं को प्रमाणित करने के लिए नकली फोटो लगा दिए जाते हैं। ये फोटो कहीं और के, किसी और घटना के होते हैं, मगर इन्हें सही मान लिया जाता है। हालत तो यह हो गई है कि शक के आधार पर किसी को भी पकड़ा जा सकता है, मारपीट, यहां तक कि हत्या भी की जा सकती है।
मीडिया में लगातार इस तरह की खबरें आ रही हैं। मगर न तो सरकार, न ही मीडिया ने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई अभियान चलाया है। लोगों के मन में डर बैठ गया है या बैठता जा रहा है कि क्या पता रास्ते में कौन घात लगाकर बैठा हो। कौन सा बदला लेना हो। आप अच्छे भले अपने बच्चे के साथ घर से किसी काम के लिए निकले हों, और सिर्फ बच्चा साथ होने के कारण चोर समझ लिए जाएं।
इन घटनाओं को पढ़-सुनकर अपना बचपन याद आता है। तब मां घर से बाहर अकेली खेलने से मना करती थी। शाम के वक्त घर से बाहर खेलना, जाना मना था, क्योंकि मां और घर वाले कहते थे कि लम्बा चोगा पहनकर बिल्लोची आते हैं और बच्चों को उस चोगे में छिपाकर उठा ले जाते हैं। बहुत बार तो वे बांसुरी सुनाकर ही बच्चों को बेहोश कर देते हैं। ये बिल्लोची शब्द क्या बला था, तब समझ में नहीं आता था। आज सोचती हूं तो लगता है कि बलूचिस्तान के लोगों को बदनाम करने के लिए इस तरह की अफवाहें फैलाई गई होंगी। या कि किसी एक बच्चे को कोई ऐसा चोगाधारी उठा ले गया होगा। और लोगों की कल्पना शक्ति ने इस घटना को खूब बढ़-चढ़ाकर पेश कर दिया होगा।
अपने बच्चों की चिंता में अक्सर माता-पिता ऐसी बातों पर यकीन कर लेते हैं, क्योंकि बच्चे अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकते, इसलिए माता-पिता की चिंता और अधिक बढ़ जाती है। जब भी पूतना और श्रीकृष्ण की कथा याद आती है तो लगता है कि उन दिनों भी ऐसी घटनाएं खूब होती होंगी। जहां स्तनों में जहर लगाकर नवजात को मार दिया जाता होगा। तभी इस कथा का निर्माण हुआ होगा। बच्चों के प्रति तरह-तरह के अपराध अपने देश में होते रहे हैं। बच्चों की बलि चढ़ाई जाती रही है। उन्हें कहीं और ले जाकर दास बनाकर बेचा जाता रहा है। इसीलिए बच्चों को लेकर परिवार वालों और समाज में बहुत असुरक्षा की भावना है।आज भी ऐसा ही हो रहा है। लेकिन बच्चा चोरी के शक मात्र से किसी को मारना और कानून हाथ में लेना कहां तक जायज है। अगर किसी पर शक है तो पुलिस से शिकायत करें, जिस पर शक है उसे पुलिस के हवाले करें, जांच कराएं। मात्र शक के आधार पर किसी को सताना ठीक नहीं है। जब ऐसा होने लगता है तो बहुत बार बदला लेने के लिए किसी के भी बारे में ऐसी अफवाहें फैलाई जाती हैं। आदमी बचाव के लिए चाहे जितनी सफाई दे, प्रार्थना करे मगर कोई नहीं सुनता।फिर भीड़ की यह मानसिकता भी है कि अगर कोई पीटा जा रहा है तो रास्ता चलता भी उसमें दो हाथ लगाना अपना परम कर्तव्य समझता है। आदमी को क्यों पीटा जा रहा है, इस बात को जानना जरूरी नहीं है। जैसे ही यह अफवाह उड़ती है कि कोई बच्चा चोर आसपास है तो लोगों के मन में अपने बच्चों को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। अस्पतालों में भी बच्चा चोरी और बच्चा बदलने की घटनाएं होती रहती हैं। ऐसा करने में बहुत से गिरोह भी सक्रिय होते हैं।
अपने बच्चों की सलामती चाहना एक अच्छी बात है। लेकिन सडक़ पर कोई स्त्री या पुरुष अपने बच्चे के साथ जा रहा है तो वह बच्चा चोर होगा, और उससे मारपीट जरूरी है , यह सोच गलत है। यदि किसी ने बच्चा चोरी का अपराध आपकी नजर में किया भी हो तो बजाय इसके कि सडक़ पर खुद न्याय करने लगें, इसकी सूचना पुलिस को दें।

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