July 26, 2021

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दिग्भ्रमित कांग्रेस

हाल ही में संपन्न हुए पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा है. वैसे तो उसके पास पुडुचेरी के अलावा अन्य कोई दूसरा राज्य था भी नहीं पर वह भी उसके हाथों से जाता रहा. केरल में कांग्रेस को उम्मीद इसलिए भी थी कि वहां हर चुनाव में जनता सत्ता बदल देती है, लिहाजा इस बार सत्तारूढ़ एलडीएफ की पराजय निश्चित मानकर कांग्रेस चल रही थी किंतु केरल के लोगों ने कांग्रेसनीत यूडीएफ को खारिज कर दिया. तमिलनाडु में पिछले चुनाव में जयललिता की पार्टी ने इतिहास रचते हुए वहां लगातार दूसरी बार सत्ता प्राप्त कर ली थी तो इस बार वहां की जनता ने करुणानिधि के दल द्रमुक को .जीत का सेहरा पहनाया. तमिलनाडु में वर्षों से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ही चुनाव होता रहा है वहां कांग्रेस और भाजपा को इन्हीं दलों के कंधों पर सवारी करनी पड़ती है. करुणानिधि के पुत्र स्टालिन के साथ कांग्रेस का गठबंधन था इसलिए उसे सांत्वना पुरस्कार के रूप में तमिलनाडु की सत्ता में थोड़ी हिस्सेदारी मिल गई. केरल में सत्ता भले ही न मिली पर प्रतिष्ठा बच गई. इन विषयों पर चर्चा करने की आज आवश्यकता इसलिए पड़ रही है क्योंकि कांग्रेस ने इन पांच राज्यों में अपनी नाकामियों के कारणों की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई थी जिसकी रिपोर्ट कल कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपी गई. समिति में ऐसा कोई व्यक्ति सदस्य नहीं था जो सीधे तौर पर केंद्रीय नेतृत्व को पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराने का हौसला रखता हो. कांग्रेस की तो यह परंपरा ही रही है कि विजय का सेहरा गांधी परिवार के सिर सजाया जाता है और हार का ठिकरा स्थानीय नेतृत्व या प्रभारियों के मत्थे फोड़ा जाता है. इस बार भी वैसा ही हुआहै. गुटबाजी पार्टी में अंतर्कलह और गठबंधन की विफलता को रिपोर्ट ने रेखांकित किया है. यहां केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका की समीक्षा से सावधानी पूर्वक कन्नी काट ली गई. सच बात तो यह है कि कांग्रेस इन दिनों नेतृत्व के संकट के दौर से गुजर रही है. कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं जरूर पर उनकी सक्रियता चुनाव नतीजों को प्रभावित करने योग्य नहीं रह गई है. वह किसी भी राज्य में प्रचार के लिए गई ही नहीं. पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी नहीं गए. राहुल गांधी की सक्रियता केरल और तमिलनाडु में जरूर रही किंतु वह असम और पश्चिम बंगाल में केवल औपचारिकता निभाने ही पहुंचे ऐसा लगा कि वे दोनों राज्यों में पराजय स्वीकार कर चुके हैं. चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी असम के चाय बागानों तक सीमित रहीं. कांग्रेस को असम में बहुत उम्मीदें थी. 5 गारंटी के साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को वहां का चुनावी प्रबंधन सौंपा गया था. छत्तीसगढ़ के ही विधायक विकास उपाध्याय को राष्ट्रीय सचिव का दर्जा देकर असम का प्रभार दिया गया. भूपेश बघेल के सलाहकारों की टीम लगभग दो-ढाई महीने वहां डेरा डाले रही. स्वयं श्री बघेल लगातार वहां सक्रिय रहे. यह सही है कि असम में प्रवासी छत्तीसगढिय़ा लोगों की बड़ी आबादी है पर वे अब असमिया रंग में रंग चुके हैं. असम के मुद्दे ही उनके अपने हैं. समीक्षा रिपोर्ट में पार्टी की गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराया गया है. ऐसी स्थितियां एक दिन में तो नहीं बनतीं. यदि हाईकमान सजग रहता तो क्या गुटबाजी को खत्म नहीं किया जा सकता था? कांग्रेस मुद्दों की पहचान करने में लगातार गलतियां कर रही है. असम से ही एनआरसी का मुद्दा गरमाया था. कांग्रेस के प्रचार के केंद्र में सीएए और एनआरसी का खात्मा था. जबकि बड़ी संख्या में असमवासी घुसपैठियों से परेशान हैं. लिहाजा अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने भाजपा का साथ दिया. केरल में कांग्रेस को भले ही सत्ता नहीं मिली मगर प्रतिष्ठा बच गई. पराजय का दूसरा प्रमुख कारण रहा गठबंधन. कांग्रेस ने इन चुनावों में किन दलों के साथ गठजोड़ किया? यह वह समूह थे जो धर्म विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं. बंगाल में अधीररंजन चौधरी के विरोध के बाद भी फुरफुरा शरीफ के मौलाना से गठबंधन किया गया. असम और केरल में भी यही किया गया. इससे कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि को धक्का लगना ही था. बंगाल में तो सुना गया कि ऐन मौके पर मौलाना के लोगों ने तृणमूल कांग्रेस का साथ दे दिया परिणाम कांग्रेस के खाते में शून्य दर्ज हुआ. आज की राजनीति में गठबंधन का बड़ा महत्व है और जनता के मुद्दों की पहचान नतीजों को बदल सकती है. पांच राज्यों के परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस गठबंधन और मुद्दों की शिनाख्त कर पाने में पूरी तरह असफल और भ्रमित रही. सबसे बड़ी बात है कांग्रेस की नकारात्मक प्रचार शैली. दरअसल, कांग्रेस की प्रवृत्ति और रणनीति भाजपा को हराने तक ही रह गई है. वह चुनावों में स्वयं की विजय के लिए नहीं उतर रही है. उसे जीतने के इरादों के साथ चुनाव लडऩा होगा तभी कुछ सफलता मिल सकती है. इस दल को एक स्पष्ट और दृश्य नेतृत्व की भी जरूरत है फिर वह चाहे राहुल गांधी हो या प्रियंका गांधी. ऐसा न हो कि आगे चलकर कांग्रेस राहुल प्रियंका गुट में बंट जाए. गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ अनुभवी नेताओं की अनदेखी पर समीक्षा रिपोर्ट की चुप्पी आश्चर्यजनक नहीं कहीं जा सकती. समीक्षा रिपोर्ट के जो नतीजे कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपे गए क्या उन पर ईमानदारी से अमल किया जाएगा या पूर्व की तरह सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?