छत्तीसगढ़

न नियम और न ही कानून का पालन, फिर भी केपीएस को अभयदान

रायपुर। सड़कों पर 12 साल से ज्यादा समय से दौड़ रही पुरानी खटारा स्कूल बसों पर शासन ने रोक लगाई है लेकिन कृष्णा पब्लिक स्कूल के डूंडा व सरोना, रायपुर एवं भिलाई नेहरू नगर स्थित ब्रांचों में दर्जन भर से अधिक प्रतिबंधित खटारा बसें चल रही हैं। जबकि बच्चों की जान जोखिम में डालने का हवाला देकर परिवहन विभाग ने स्कूल प्रबंधन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, लेकिन मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। क्यों डाल दिया गया? ये तो जिम्मेदार अफसर ही जानें।
केंद्रीय व छग मोटरयान अधिनियम
सड़कों पर हो रही वाहन दुर्घटनाओं एवं मौतों पर लगाम कसने के लिए केन्द्रीय परिवहन मंत्रालय ने बीते साल से कुछ अहम बदलाव करने शुरू किए गए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मोटरयान अधिनियम में समय-समय पर संशोधन किए हैं। सड़कों पर 12 साल से ज्यादा समय से दौड़ रहे स्कूल बसों को संचालन की अनुमति नहीं देने के आदेश दिए हैं। केन्द्रीय मोटरयान अधिनियम 1988 तथा छत्तीसगढ़ मोटरयान अधिनियम 1994 के इन संशोधनों के अनुसार 12 साल से ज्यादा पुरानी स्कूल बसों को अनफिट किया जाना है और इन्हें परमिट जारी नहीं करने तथा कालातीत किया जाना है। लेकिन इसके बाद भी कृष्णा पब्लिक स्कूल में इसका पालन नहीं किया जा रहा।
जांच में केपीएस की कई बसें खटारा
काबिलेगौर हो कि हाल ही में परिवहन विभाग द्वारा स्कूली बसों के लिए सभी जिलों में जांच शिविर आयोजित किया गया। कृष्णा पब्लिक स्कूल की 23 बसों की जांच में पाया गया कि 04 बसें तत्काल बंद किया जाना चाहिए एवं 08 बसें अनफिट पाई गई। सरोना ब्रांच की 20 बसों में से 06 बसें अनफिट पाई गई। भिलाई ब्रांच की 40 बसों में से 03 बसें प्रतिबंधित और 09 बसें अनफिट पाई गई। सारी जानकारी होने के बावजूद भी अपने कर्तव्यों का पालन करने में जिम्मेदार अफसरों के हाथ पांव क्यों कांप रहे।
लगातार होती हैं दुर्घटनाएं
हाल ही में अप्रैल और मई माह में कृष्णा पब्लिक स्कूल बस दुर्घटना का शिकार हो गई थी। इससे पहले भी कई बार स्कूल बस दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी है, जिसमें अनियंत्रित गति, ओवरलोड बच्चे और ब्रेक फेल होने की बातें सामने आई हैं। ऐसे में यदि सड़कों पर पुरानी खटारा बसें चलती हैं तो हादसे होना स्वाभाविक है जिसमें स्कूली बच्चों की जान जाने की भी आशंका बढ़ती है।
जागरूक बने पालक
पालकों को भी सावधानी बरतना होगी और सतर्कता के साथ ध्यान देना होगा। बच्चें जिस स्कूली बसों से आना जाना कर रहे, वे कैसी बसें हैं। उन बसों की स्थिति को ध्यान में रखना होगा। बस क्रमांक डायरी में नोट करके रखें। आखिरकार ये कैसा नज़रिया है कि मात्र श्रेष्ठ इन्फ्रास्ट्रक्चर देखकर पालक अभिभूत है। उन्हें समझना होगा कि बच्चों को जो शिक्षक शिक्षा दे रहें, वे किस काबिल हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसे शिक्षक पढ़ा रहें जिनकी स्वंय की उपलब्धि दोयम दर्जे की है। अनुभव का अपना अलग महत्व है किंतु इसका ये अर्थ नहीं कि किसी के भी हाथों में बच्चों का भविष्य सौंप दिया जाएं। केपीएस में अधिकांश शिक्षक डिप्लोमा या डिग्रीधारी नहीं है, सब काम चलताऊ शिक्षकों को रखा गया है। स्वाभाविक है कि कम वेतन में श्रेष्ठ शिक्षक कहां से आएंगे।
खटारा बसें और किराया मनमाना
प्राइवेट स्कूल संचालक ट्रांसपोर्ट फीस के नाम पर शहर में एक बच्चे से औसतन 700 रुपए से लेकर 1200 रुपए तक ले रहे हैं। प्रति किमी के हिसाब से भी इसकी गणना करें तो यह राशि परिवहन विभाग के अनुसार एसी एवं सुपर डीलक्स बसों की तुलना में भी काफी ज्यादा है लेकिन ऐसा करने के बाद भी कृष्णा पब्लिक स्कूल प्रबंधन गुणवत्ता एवं सुरक्षा पर ध्यान नहीं दे रहा है।
स्कूली बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन विषय पर आज भिलाई इंजीनियरिंग कॉलेज में दुर्ग जिले के सभी स्कूलों के प्राचार्यों,स्कूल प्रबंधन और स्कूल बसों के चालकों और परिचालकों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का आयोजन राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग और छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किया गया । कार्यशाला में उच्चतम न्यायालय द्वारा स्कूल बसों में बच्चों की सुरक्षा के लिए दिए गए निर्देशों पर विस्तार से चर्चा की गई। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष श्रीमती प्रभा दुबे ने कहा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सभी स्कूलों द्वारा संचालित स्कूल बसों में सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाए। श्रीमती दुबे ने कहा कि आयोग बच्चों की सुरक्षा के संबंध में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगा ।उन्होंने कहा कि न्यायालय द्वारा स्कूल बसों के लिए विभिन्न मानक तय किए गए हैं जिसका पालन अनिवार्यत: होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जैसे स्कूल द्वारा पंजीकृत बसों में ही बच्चों के परिवहन की व्यवस्था करना ,बसों में महिला कंडक्टर,आपात काल के समय उपयोगी अग्निशमन यंत्र और फर्स्ट एड बॉक्स की व्यवस्था ,स्कूल बसों में परिवहन करने वाले बच्चों के नाम उम्र कक्षा और ब्लड ग्रुप की जानकारी, बस में स्कूल का संपर्क नम्बर आदि। कार्यशाला में विषय विशेषज्ञ द्वारा बच्चों को लैंगिक शोषण से बचाने के उपायों, बच्चों के अधिकारों और उनके सरंक्षण से जुड़े अधिनियमों पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यशाला में चालकों और परिचालकों को किसी भी आपात स्थिति से बचने और आपात स्थिति में उठाए जाने वाले उपायों पर भी जानकारी दी गयी। कार्यक्रम में आयोग के सदस्य श्रीमती इंदिरा जैन, सुश्री टी आर श्यामा, श्रीमती मीनाक्षी तोमर नंदलाल चौधरी, राष्ट्रीय बाल आयोग के टेक्निकल एक्सपर्ट श्री रजनीकांत, जिला शिक्षा अधिकारी श्री आशुतोष चावरे एवं परिवहन एवं यातायात विभाग के अधिकारी कर्मचारी भी उपस्थित हुए।
बच्चों की जान खतरे में डाल रहा केपीएस
कृष्णा पब्लिक स्कूल की लगभग दो चार बसों को छोड़कर शेष किसी स्कूल बस पर परमिट संख्या व परमिट तिथि का उल्लेख नहीं है। वहीं ज्यादातर बसों में परमिट वर्ष 2015-16 तक ही लिखी हुई है। चालक व उपचालक का नाम व मोबाइल नंबर लिखा होना आवश्यक है। चालक ड्रेस में होना चाहिए। अन्यथा स्कूल बस अनफिट कैटेगरी में है। जबकि केपीएस की अधिकांश बसों पर न नंबर है और ना ही नाम और ना ही चालक ड्रेस में होतें हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि दो सत्र बीत चुका है और तीसरा सत्र आधा बीतने को है लेकिन परमिट का नवीनीकरण नहीं कराया गया है, ऐसे में बसों की फिटनेस पर सवालिया निशान लग रहा है। केपीएस प्रबंधन को इससे क्या लेना देना, हादसे में मरने वाले छात्र इनके खुद के नहीं होंगे इसलिए अनफिट बसें धड़ल्ले से दौड़ रही है। तो इंतेज़ार कीजिए किसी गंभीर दुर्घटना का। जब तक दुर्घटना नहीं होगी और दो चार बच्चें बुरी तरह से घायल अथवा जानें नहीं जाएंगी तब तक केपीएस प्रबंधन और जिम्मेदार अधिकारी घोड़ा बेचकर सोते रहेंगें। लेकिन जिनके लाल इन खटारा बसों से आना जाना कर रहें, उन्हें तो हादसे से पहले चेतना होगा।
….लगातार

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