*मान ध्यान में उलझा मन दुख,दुर्गति और पीड़ा की ओर ही जाता है : मुनि संवेगरत्न सागर म.सा.*
रायपुर |
2026-09-26 17:24:59
दूसरों की प्रशंसा सुनकर ईर्ष्या नहीं, खुशी महसूस करें*
रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में शुक्रवार को परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने मान ध्यान के क्रम को गति दी। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित 'आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को मान ध्यान और इससे जुड़े कषायों से बचने का संदेश दिया।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में विनय का आलंबन होना चाहिए। गुरु के हृदय में हर शिष्य के लिए स्थान होता है। गुरु सभी का भला चाहते हैं और सबको समान रूप से सीख देते हैं, लेकिन जब शिष्य के हृदय में गुरु के प्रति श्रद्धा और स्थान होता है, तभी वास्तविक विनय का भाव विकसित होता है।
मुनिश्री ने कहा कि मान ध्यान के निमित्त यदि किसी के प्रति वैर भाव उत्पन्न हुआ है तो उसके लिए क्षमायाचना करनी चाहिए। वैर भाव व्यक्ति को मान ध्यान में उलझाए रखता है। इसलिए जरूरी है कि व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या और जलन के भावों को पहचाने और उनके कारणों पर आत्मचिंतन करे।
मुनिश्री ने कहा कि यह ध्यान रखना जरूरी है कि मान ध्यान कब, कहां और कितनी बार हो रहा है। इसके साथ यह समझना भी आवश्यक है कि आखिर किन कारणों से मन में किसी व्यक्ति के प्रति क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या या जलन जैसी कषाय उत्पन्न हो रही हैं। यही भाव व्यक्ति को मान ध्यान की परंपरा में आगे बढ़ाते हैं। मान ध्यान में उलझे रहने से जीवन में दुख, दुर्गति और पीड़ा की परंपरा के अलावा कुछ प्राप्त नहीं होता।
*दूसरों की उपलब्धि में आनंद लेने की सीख*
मुनिश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि जब किसी दूसरे व्यक्ति की प्रशंसा हो तो मन में ईर्ष्या के बजाय प्रसन्नता का भाव आना चाहिए। दूसरों के गुणों को स्वीकार करना और उनकी उपलब्धि में आनंद महसूस करना मन को कषायों से मुक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मुनिश्री ने कहा कि मान का त्याग तभी संभव है, जब व्यक्ति स्वयं को हर समय केंद्र में रखने की आदत से बाहर निकले। अपनी प्रशंसा की अपेक्षा छोड़कर दूसरों के गुणों को स्वीकार करना और जीवन में विनम्रता को अपनाना ही आत्मशुद्धि का मार्ग है।