धान की फसल में पेनिकल माइट एवं गर्दन झुलसा रोग से बचाव के लिए किसानों को दी गई सामयिक सलाह
उत्तर बस्तर कांकेर, 09 अक्टूबर 2026
धान की फसल में पेनिकल माइट (मकड़ी) एवं गर्दन झुलसा रोग के प्रकोप से उत्पादन और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे बचाव के लिए किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने, संतुलित उर्वरकों का उपयोग करने तथा समय पर उचित प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी गई है। कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर के विषय वस्तु विशेषज्ञ (पौध रोग विज्ञान) उपेन्द्र कुमार नाग ने किसानों को इन समस्याओं के लक्षणों की पहचान कर समय पर नियंत्रण के उपाय अपनाने की जानकारी दी है।
पेनिकल माइट के लक्षण एवं नुकसान
पेनिकल माइट के प्रकोप से धान की पर्णच्छद (लीफ शीथ) का रंग भूरा पड़ने लगता है तथा पत्तियों पर छोटे-छोटे भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। अधिक प्रकोप होने पर दाने अनियमित आकार के हो जाते हैं। दानों में दूध भराव नहीं होने से वे पोचे या बदरा रह जाते हैं। कई बार दाने तोते की चोंच जैसे आकार के दिखाई देते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘पैरट बीकिंग’ कहा जाता है। यह सूक्ष्म मकड़ी धान की पत्ती के भीतर पर्णच्छद में छिपकर रस चूसती है। इसके कारण पर्णच्छद पर दालचीनी रंग के या भूरे-चॉकलेटी चकत्ते बन जाते हैं। पत्ती के बाहरी आवरण को खोलकर इसकी उपस्थिति की पहचान की जा सकती है। दानों में दूध भरने की अवस्था में इसका प्रकोप अधिक नुकसान पहुंचाता है। प्रभावित स्थानों पर फफूंद का संक्रमण भी हो सकता है, जिससे दानों का विकास बाधित होता है और बालियों में बदरा दानों की संख्या बढ़ जाती है।
पेनिकल माइट के प्रबंधन के उपाय
किसानों को पेनिकल माइट के नियंत्रण के लिए सलाह देेते हुए बताया गया है कि नत्रजन उर्वरकों सहित सभी उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग करें। बीज दर उचित रखें तथा पौधों के बीच लगभग 15 से 15 सेंटीमीटर की दूरी बनाए रखें। फसल की कटाई के बाद अवशेषों को मिट्टी में दबाएं। लगातार धान की फसल लेने के बजाय फसल चक्र अपनाएं। विशेषकर दलहनी एवं तिलहनी फसलों को शामिल करना लाभकारी हो सकता है। फसल की नियमित निगरानी करें तथा पर्णच्छद को खोलकर माइट की उपस्थिति की जांच करें। रासायनिक नियंत्रण के लिए पंजीकृत एवं अनुशंसित कीटनाशक या माइटनाशक का ही उपयोग करें। दवा का चयन, मात्रा और छिड़काव का समय स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह तथा उत्पाद के लेबल के अनुसार निर्धारित करें।
गर्दन झुलसा रोग के लक्षण
धान में गर्दन झुलसा रोग का संक्रमण पत्तियों, पर्णच्छद, तने के गांठ वाले हिस्से, बाली की गर्दन तथा बाली के अन्य भागों पर दिखाई दे सकता है। प्रारंभ में पत्तियों पर छोटे, लगभग 1 से 3 मिलीमीटर के धब्बे बनते हैं। ये धब्बे आंख या नाव के आकार के होते हैं। इनका मध्य भाग धूसर तथा किनारे भूरे या गाजरी-भूरे रंग के होते हैं। तने और बाली की गर्दन पर संक्रमण होने से नुकसान अधिक होता है। बाली की गर्दन प्रभावित होने पर दानों में आधा या बिल्कुल भी भराव नहीं हो पाता, जिससे बालियां बदरा रह जाती हैं। कई बार बालियां पकने से पहले ही संक्रमित स्थान से टूट जाती हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
गर्दन झुलसा रोग का प्रबंधन
गर्दन झुलसा रोग की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चयन सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। किसानों को धान की कर्मामासुरी, दन्तेश्वरी, इंदिरा सोना एवं आईआर-64 जैसी किस्मों के संबंध में स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से उपयुक्तता की पुष्टि कर खेती करने की सलाह दी गई है। रोग के नियंत्रण के लिए एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत $ डाइफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत जैसे कवकनाशी का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी भी दवा का उपयोग करने से पहले धान में संबंधित रोग के लिए उसके वर्तमान पंजीकरण, लेबल पर दी गई मात्रा, प्रतीक्षा अवधि और स्थानीय कृषि विभाग की अनुशंसा की पुष्टि करना आवश्यक है। छिड़काव निर्धारित सुरक्षा उपायों के साथ ही करें तथा अलग-अलग दवाओं को बिना विशेषज्ञ की सलाह के न मिलाएं।
किसानों से नियमित निगरानी की अपील
कृषि विज्ञान केंद्र, कांकेर के विषय वस्तु विशेषज्ञ (पौध रोग विज्ञान) उपेन्द्र कुमार नाग ने किसानों से अपील की है कि वे धान की फसल में पेनिकल माइट एवं गर्दन झुलसा रोग के शुरुआती लक्षणों पर ध्यान दें और समय पर प्रबंधन उपाय अपनाएं। नियमित निगरानी, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, फसल चक्र तथा उपयुक्त किस्मों का चयन करके फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।