*आखिर बायसन की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा* रेस्क्यू से रिहाई तक और फिर मौत: संरक्षित ‘गौर’ प्रकरण में जवाबदेही तय हो
कबीरधाम |
2026-04-27 10:33:47
कवर्धा,
विगत कुछ दिनों पूर्व एक बायसन पानी की तलाश में भटकटे हुवे पंडरिया के जंगल में आ पहुंचा। उसे शिकारियों ने तीर से घायल कर दिया था।
तीरों से घायल वयस्क गौर (भारतीय बायसन) को जटिल शल्य-चिकित्सा के बाद “स्वस्थ” बताकर जंगल में छोड़ा दिया गया, बीच बीच मे उसके हालत खराब होने की खबरे आती रही लेकिन विभाग ने उसे अति गंभीरता से नहीं लिया। 25 अप्रैल की रात को उसकी मृत्यु हो गई। यह घटनाक्रम केवल एक वन्यजीव की मौत नहीं, बल्कि संरक्षण तंत्र की प्रक्रियाओं और जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।
गौर अनुसूची–I में संरक्षित प्रजाति है, जिसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। अधिनियम की धारा 9 शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है, जबकि धारा 39 के अनुसार वन्यजीव राज्य की संपत्ति हैं। ऐसे में यदि किसी संरक्षित वन्यजीव की मृत्यु उपचार के बाद होती है, तो यह केवल शिकार का मामला नहीं रह जाता, बल्कि प्रबंधन, निगरानी और निर्णय प्रक्रिया की वैधानिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी बनता है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बायसन के शरीर से तीन तीर निकाले गए और ऑपरेशन किया गया। वन्यजीव चिकित्सा मानकों के अनुसार, गंभीर मांसपेशीय चोट और संभावित संक्रमण की स्थिति में विस्तृत पोस्ट-ऑपरेटिव केयर, नियंत्रित निगरानी, संक्रमण-रोधी उपचार और तापीय तनाव से सुरक्षा अनिवार्य होती है। अप्रैल की भीषण गर्मी में ऐसे वन्यजीव को खुले जंगल में छोड़ने का निर्णय जोखिम मूल्यांकन और चिकित्सकीय सलाह के अनुरूप था या नहीं, यह अब जांच का विषय है।
यदि पर्याप्त रिकवरी अवधि, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और ट्रैकिंग सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक चूक की श्रेणी में आ सकता है। भारतीय सुधार संहिता की प्रासंगिक धाराएं तथा सेवा आचरण नियम, सरकारी कर्तव्यों में लापरवाही की स्थिति में दायित्व तय करने का आधार प्रदान करते हैं। संरक्षण कानून की सख्ती केवल शिकारियों तक सीमित नहीं रह सकती; विभागीय निर्णयों की पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है।
इस मामले में स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन, पोस्टमार्टम रिपोर्ट का सार्वजनिक प्रकटीकरण और उपचार से रिहाई तक की पूरी मेडिकल फाइल की समीक्षा आवश्यक है। यदि उपचार या पुनर्वास में कमी सिद्ध होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
यह प्रकरण स्पष्ट करता है कि वन्यजीव संरक्षण केवल रेस्क्यू ऑपरेशन की सफलता से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पुनर्वास, निरंतर निगरानी और संस्थागत जवाबदेही से परिभाषित होता है।