छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

करोड़ों की नहर में खेल! शुरुआत से ही ‘संकरी सोच’, भविष्य की तारीख में शुरू हुआ काम, पहली बारिश में बहने की आशंका

 कवर्धा

 छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले पंडरिया विकासखंड के अपर - आगर व्यापवर्तन योजना के शीर्ष कार्य एवं नगरों का कार्य संरचनाओं का जीर्णोद्धार कार्य  में 5 करोड़ 30 लाख 80 हजार रुपये की लागत से बन रही नहर परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। निर्माण स्थल पर लगी शासकीय सूचना पट्टिका खुद ही पूरे मामले की पोल खोलती नजर आ रही है। एक ओर कार्य लगभग पूर्णता की ओर बताया जा रहा है, वहीं बोर्ड पर कार्य प्रारंभ तिथि 03 नवंबर 2026 दर्ज है, जबकि वर्तमान समय मई 2026 चल रहा है। यानी कागजों में काम भविष्य में शुरू होना है, लेकिन जमीन पर लगभग खत्म होने की स्थिति में है। यह विरोधाभास केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधा संकेत देता है।

स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारियों के अनुसार नहर निर्माण की शुरुआत में ही गंभीर तकनीकी खामियां दिखाई दे रही हैं। नहर का प्रारंभिक हिस्सा संकरा बनाया गया है, जबकि आगे जाकर उसे चौड़ा कर दिया गया है। तकनीकी जानकारों का मानना है कि यदि शुरुआत में ही पानी का प्रवाह सीमित कर दिया जाएगा तो बाद में नहर को चौड़ा करने का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं रह जाता। पानी की आपूर्ति की क्षमता वही रहेगी जो शुरुआती हिस्से की चौड़ाई तय करेगी। ऐसे में आगे चौड़ा निर्माण केवल बजट खपत का माध्यम प्रतीत होता है।

डिजाइन और क्रियान्वयन के बीच तालमेल की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। यदि शुरुआत संकरी है तो अंतिम छोर तक पानी की उपलब्धता पर सीधा असर पड़ेगा। किसानों को सिंचाई सुविधा देने के नाम पर बनाई जा रही यह नहर वास्तविक लाभ देने के बजाय कागजी उपलब्धि बनने की दिशा में बढ़ती नजर आती है।

निर्माण के दौरान एक और गंभीर लापरवाही सामने आई है। खुदाई से निकली मिट्टी को नहर से दूर हटाने के बजाय किनारे पर ही छोड़ दिया गया है। बरसात के मौसम में यही ढीली मिट्टी बहकर दोबारा नहर में जमा हो सकती है। इससे नहर की जलधारण क्षमता घटेगी और कुछ ही महीनों में नहर पुनः मिट्टी से भरने का खतरा पैदा हो जाएगा। जिस उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वह पहली ही बारिश में प्रभावित हो सकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो देशभर में सिंचाई परियोजनाओं में गुणवत्ता को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं। कबीरधाम की यह परियोजना भी उसी श्रेणी में जाती दिखाई दे रही है, जहां योजना का उद्देश्य किसानों तक पानी पहुंचाना कम और बजट उपयोग दिखाना ज्यादा प्रतीत होता है।

सूचना पट्टिका में दर्ज 530.80 लाख रुपये की राशि, निविदाकार का नाम और कार्य एजेंसी का उल्लेख स्पष्ट है, लेकिन जब प्रारंभ तिथि ही भविष्य की लिखी गई हो तो पारदर्शिता पर विश्वास कमजोर पड़ता है। यदि तिथि त्रुटिपूर्ण है तो अब तक उसका संशोधन क्यों नहीं किया गया। और यदि दर्ज तिथि सही मानी जाए तो जमीन पर चल रहा निर्माण प्रशासनिक प्रक्रियाओं की गंभीर अनदेखी को दर्शाता है।

यह मामला केवल एक नहर का नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता का है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल संसाधन परियोजनाएं किसानों की जीवनरेखा होती हैं। यदि उनमें तकनीकी खामियां और दस्तावेजी विसंगतियां पाई जाती हैं तो यह सीधे-सीधे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की आशंका को मजबूत करता है।

अब आवश्यक है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग तत्काल उच्चस्तरीय तकनीकी जांच कराएं। डिजाइन स्वीकृति, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण और कार्य प्रगति रिपोर्ट की स्वतंत्र जांच हो। यदि अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

क्योंकि मुद्दा केवल निर्माण का नहीं, बल्कि किसानों की उम्मीदों और सार्वजनिक धन की जवाबदेही का है। यदि शुरुआत ही संकरी सोच से होगी तो विकास की धारा अंत तक प्रभावी रूप से पहुंच पाना संभव नहीं रहेगा।

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