छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

एकलव्य आवासीय विद्यालय में मासूम पर बर्बरता के आरोप, सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल!

 एकलव्य आवासीय विद्यालय में मासूम पर बर्बरता के आरोप, सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल!


कमरे में बंद कर जूनियर छात्र की पिटाई का आरोप; कान, आंख और पीठ पर चोट के निशान, परिजनों में भारी आक्रोश

कवर्धा। आदिवासी बैगा बच्चों के बेहतर भविष्य, शिक्षा और संस्कार के नाम पर संचालित पीएमश्री एकलव्य आवासीय विद्यालय एवं छात्रावास की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। तरेगांव थाना क्षेत्र स्थित पीएमश्री एकलव्य हॉस्टल में सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर छात्र को कथित रूप से कमरे में बंद कर पिटाई किए जाने का मामला सामने आया है। परिजनों के अनुसार मारपीट के बाद बच्चे के कान, आंख और पीठ पर चोट के निशान पाए गए हैं। घटना की शिकायत थाने तक पहुंचने के बाद परिजनों का आक्रोश बढ़ गया है।

यह मामला केवल दो बच्चों के बीच हुए विवाद का नहीं माना जा सकता। सवाल यह है कि लगभग 400 आदिवासी बैगा बच्चे जब अपने परिवार से दूर रहकर प्रशासन की निगरानी में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, तब छात्रावास के भीतर एक बच्चे को कथित रूप से कमरे में बंद कर पीटे जाने की नौबत आखिर कैसे आई?
बच्चों की सुरक्षा के नाम पर इतनी बड़ी चूक कैसे?
कक्षा 6वीं से 12वीं तक के बच्चे इस आवासीय विद्यालय में रहकर पढ़ाई करते हैं। इनके लिए छात्रावास महज भवन नहीं, बल्कि घर से दूर उनका सुरक्षित आश्रय है। माता-पिता अपने बच्चों को भरोसे के साथ यहां छोड़ते हैं कि शासन की व्यवस्था में वे सुरक्षित रहेंगे।

लेकिन यदि छात्रावास के भीतर ही कोई जूनियर छात्र कथित मारपीट का शिकार होता है और उसके शरीर पर चोट के निशान दिखाई देते हैं, तो यह पूरी निगरानी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

आखिर उस समय जिम्मेदार कर्मचारी कहां थे?

 निगरानी कौन कर रहा था? बच्चे को कमरे में बंद किए जाने की जानकारी समय रहते किसी को क्यों नहीं हुई? और यदि जानकारी हुई तो तत्काल क्या कार्रवाई की गई ?

इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना होगा।

अधीक्षक की जिम्मेदारी से प्रशासन नहीं भाग सकता
छात्रावास में बच्चों की सुरक्षा, अनुशासन और निगरानी की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित नहीं हो सकती। अधीक्षक और ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों का दायित्व है कि वे बच्चों के बीच होने वाले विवादों पर नजर रखें और किसी भी हिंसक स्थिति को तत्काल रोकें।


यदि जांच में यह सामने आता है कि जिम्मेदार

 कर्मचारी मौके पर मौजूद नहीं थे, निगरानी में गंभीर लापरवाही हुई अथवा घटना की जानकारी मिलने के बाद भी समय पर उचित कदम नहीं उठाया गया, तो जिम्मेदारी तय किए बिना मामले को दबाना व्यवस्था के साथ अन्याय होगा।
सिर्फ कथित रूप से मारपीट करने वाले छात्रों पर कार्रवाई करके मामले को खत्म कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जांचना होगा कि जिस व्यवस्था के संरक्षण में बच्चा रह रहा था, वह व्यवस्था उस समय कहां थी?

चार साल पुराना मामला, फिर भी सबक नहीं लिया?


इस मामले को और गंभीर बनाता है छात्रावास से जुड़ा पुराना रिकॉर्ड। बताया जा रहा है कि करीब चार वर्ष पूर्व भी इसी छात्रावास में मारपीट का मामला सामने आया था। उस समय प्रभारी अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें हटाया गया था।
यदि पुराने मामले के बाद भी आज ऐसी शिकायत दोबारा सामने आ रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि पिछली घटना से आखिर क्या सबक लिया गया?

क्या निगरानी व्यवस्था मजबूत की गई थी?

क्या रात्रिकालीन सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा हुई?
क्या बच्चों के लिए प्रभावी शिकायत तंत्र बनाया गया?
क्या जिम्मेदार कर्मचारियों की जवाबदेही तय की गई?
यदि इन व्यवस्थाओं के बावजूद बच्चा छात्रावास के भीतर कथित हिंसा का शिकार हुआ है, तो यह महज एक घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों का गंभीर संकेत है।

एकलव्य के नाम पर चल रहे संस्थान में भय का माहौल क्यों?

‘एकलव्य’ संघर्ष, समर्पण और शिक्षा का प्रतीक माना जाता है। आदिवासी समाज के बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित ऐसे संस्थान में यदि बच्चे भय या हिंसा के माहौल में रहने को मजबूर हों, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?

सरकार बच्चों को स्कूल तक पहुंचा सकती है,

 छात्रावास दे सकती है और किताबें उपलब्ध करा सकती है, लेकिन यदि सुरक्षा और सम्मान का वातावरण नहीं दे पाई तो पूरी व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
घर से दूर रहने वाले बच्चे अपने माता-पिता पर भरोसा करते हैं और माता-पिता शासन की व्यवस्था पर। इस भरोसे में जरा-सी भी दरार बच्चों के भविष्य पर गहरा असर डाल सकती है।

दोषियों के साथ लापरवाही करने वालों पर भी हो कार्रवाई

अब प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ घटना की जांच करने की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने की है। कथित मारपीट में शामिल छात्रों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसके साथ ही छात्रावास अधीक्षक, ड्यूटी कर्मचारियों और निगरानी व्यवस्था की भूमिका की भी जांच आवश्यक है।

रात्रिकालीन निगरानी, कमरों की नियमित निगरानी,

 छात्रों की शिकायत सुनने की व्यवस्था, अनुशासन प्रणाली और हिंसा की किसी भी शिकायत पर तत्काल हस्तक्षेप—इन सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए।
यदि लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी नियमानुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

सवाल एक बच्चे का नहीं, सैकड़ों बच्चों की सुरक्षा का है


परिजनों का आक्रोश केवल एक बच्चे को लगी चोट तक सीमित नहीं है। यह उन सैकड़ों बैगा बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है, जो अपने परिवार से दूर रहकर बेहतर शिक्षा और भविष्य का सपना देख रहे हैं।
अब प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि छात्रावास में बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं।
किसी भी आवासीय विद्यालय की सफलता केवल परीक्षा परिणाम और भवनों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली परीक्षा यह है कि वहां रहने वाला सबसे कमजोर और सबसे छोटा बच्चा खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है।
एकलव्य आवासीय विद्यालय में यदि एक जूनियर छात्र को कथित रूप से कमरे में बंद कर पीटे जाने की शिकायत सामने आती है, तो इसे सामान्य

 अनुशासनहीनता कहकर नजरअंदाज करना बेहद गंभीर भूल होगी।

प्रशासन को चाहिए कि मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कराए, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी बच्चे को छात्रावास के भीतर ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

बच्चों की सुरक्षा कोई एहसान नहीं, उनकी बुनियादी जिम्मेदारी है। और इस जिम्मेदारी में लापरवाही किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

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