छत्तीसगढ़ / रायपुर

भारतबाला की ‘रामनामी’ को सवश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री के लए राष्ट्रीय फल्म पुरस्कार,छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय को राष्ट्रीय मंच पर मली पहचान

 

 भारतबाला की ‘रामनामी’ को सवश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री के लए राष्ट्रीय फल्म पुरस्कार,छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय को राष्ट्रीय मंच पर मली पहचान

     राष्ट्रपत द्रौपदी मुमू ने गुजरात के एकता नगर में आयोिजत 72वें राष्ट्रीय फल्म पुरस्कार समारोह में सम्मान प्रदान कया — दशकों में पहली बार यह समारोह दल्ली के बाहर आयोिजत हुआ

रायपुर, छत्तीसगढ़ — फ़िल्मकार भरतबाला की डॉक्यूमेंट्री रामनामी, जो छत्तीसगढ़ के मध्य और उत्तरी क्षेत्रों में बसे रामनामी समुदाय का चित्रण करती है, ने 72वें राष्ट्रीय फल्म पुरस्कार समारोह में श्रेष्ठ वृत्तचत्र (Best Documentary) की श्रेणी में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुजरात के एकता नगर में, स्टैच्यू ऑफ यूनटी की तलहटी में आयोजित समारोह में भरतबाला को यह सम्मान प्रदान किया— जो दशकों में पहली बार है जब राष्ट्रीय फल्म पुरस्कार समारोह नई दल्ली से बाहर आयोिजत हुआ।

भरतबाला की यह डॉक्यूमेंट्री इस समुदाय को गायक-संगीतकार कैलाश खेर की आवाज़ के साथ प्रस्तुत करती है, जिन्होंने “राम ही पार लगावेंगे” गीत के माध्यम से इसकी आत्मा को स्वर दया। यह सहयोग एक संयोग से शुरू हुआ — शू टंग से पहले एयरपोट पर हुई एक बातचीत के दौरान — और फिल्म का अभन्न हस्सा बन गया। खेर का संगीत “बाहर राम, भीतर राम, मोरा रोम-रोम राम ही राम” की पंक्ति के माध्यम से उस भिक्त को अभव्यक्त करता है, जो समुदाय के अनुसार, उनके शरीर के हर कण में रची-बसी है।

“रामनामी के लए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतना मेरे लए बेहद वनम्रता का क्षण है, लेकन मैं इसे कसी फल्म की नहीं, बिल्क उन लोगों और जीवंत परंपराओं की पहचान मानता हू जिन्होंने हमें अपनी दुनया में प्रवेश करने और अपनी कहानी कहने का अवसर दिया। रामनामी के माध्यम से हमें एक ऐसे समुदाय

से मलने का सौभाग्य मिला, जिनके लिए आस्था केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि वह कुछ है जिससे वे अपने शरीर पर, अपने जीवन में और अपनी पहचान में धारण करते हैं। उनकी कहानी भिक्त, संघषशीलता और असाधारण मानवीय गरमा की कहानी है। मेरे लए, वृत्तचत्र नमाण अंततः सुनने की कला है। यह उन आवाज़ों, स्मृतयों और जीवन शैलयों को संरक्षत करने के बारे में है जो हमारी सामू हक चेतना का हस्सा बने रहने योग्य हैं। यह राष्ट्रीय पुरस्कार सबसे पहले रामनामी समुदाय का है, और छत्तीसगढ़ के उन तमाम लोगों का है जिन्होंने अपनी कहानयां हम पर भरोसा करके साझा कीं।

छत्तीसगढ़ मेरे लए खोज की एक असाधारण यात्रा रहा है। यहां की सांस्कृ तक वरासत विशाल, प्राचीन और अद्भुत रूप से जीवंत है। अपने काम के माध्यम से हमें बैगा जनजात, ढोकरा कला, बाइसन हॉन मारया समुदाय, घोटुल परंपरा और सरपुर की भव्य वरासत का फल्मांकन करने का सौभाग्य मिला, जिससे संस्कृ त वभाग छत्तीसगढ़ का सहयोग मला, ये डॉक्यूमेंट्री अभी रलीज़ के लए तैयार हैं। इनमें से हर यात्रा ने उस सभ्यता के एक नए पहलू को उजागर किया , जो अपने लोगों, अपनी शल्पकलाओं, अपने अनुष्ठानों, अपने संगीत और अपनी सामू हक स्मृत के माध्यम से आज भी जीवंत है।” — भरतबाला गणपत, निर्देशक, रामनामी

यह फल्म एक ऐसे दलत समुदाय की ओर राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करती है, जिनकी राम नाम के प्रति भक्ति उनकी त्वचा पर अक्षरशः अंकत है। उनकी कहानी लगभग 1890 में शुरू होती है, जब परसुराम भारद्वाज नामक एक दलत व्यिक्त को उनकी जात के कारण गांव के मं दर में प्रवेश से वंचत कर दया गया। इसके जवाब में उन्होंने अपने पूरे शरीर पर “राम” शब्द गुदवा लया। उनके समुदाय ने भी यही राह अपनाई, यह संकल्प लेते हुए क अब कोई भी उन्हें भगवान से दूर नहीं रख सकेगा। रामनामी समुदाय के लए शरीर ही मं दर बन जाता है — हर इंच पर पवत्र नाम अंकत, बहष्कार से जन्मी आस्था का एक अद्भुत और दृश्यात्मक रूप से प्रभावशाली प्रदशन।पछले वष, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर रामनामी समुदाय का सम्मान कया था।

भरतबाला के बारे में

भरतबाला गणपति एक भारतीय फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता हैं, जिन्होंने सनेमा, टेलीवज़न विज्ञापनों और वृत्तचत्रों के क्षेत्र में काम कया है। उन्होंने सबसे पहले राष्ट्रीय पहचान हासल की देशभिक्त गीतों वंदे मातरम् (1997) और जन गण मन (2000) से, जो उन्होंने अपने दीर्घकालिक सहयोगी ए.आर. रहमान के साथ मिलकर बनाए। उनकी पहली फीचर फिल्म हरि ॐ का प्रीमयर 2004 में टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में हुआ और इसने आठ ऑडयंस अवॉड जीते। इसके बाद आई समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्म मरयन (2013), जिसमें धनुष और पावती ने अभनय कया। उन्होंने 500 से अधक वज्ञापन अभयानों का नदशन भी कया है, जिनमें इनक्रेडबल इंडया और स्कूल चलें हम शामल हैं।

वर्चुअल भारत के बारे में

वर्चुअल भारत एक लघु वृत्तचत्र श्रृंखला है — भारत की अनकही कहानयां — जिससे फ़िल्मकार भरतबाला ने 15 अगस्त, 2019 को शुरू कया था। इस परयोजना का उद्देश्य 1,000 लघु फल्में बनाना है, जो भारत भर के आम लोगों, परंपराओं, कला और लोककथाओं को दशाती हैं। ए.आर. रहमान, गुलज़ार और श्रेया घोषाल जैसे सहयोगियों के साथ, वर्चुअल भारत सिनेमाई कौशल को जमीनी स्तर की कहानी कहने के साथ जोड़ता है। इसका मशन सांस्कृ तक ज्ञान को संरक्षत करना और अक्सर अनदेखे रह जाने वाले समुदायों को उजागर करना है, जिससे यह “मानव कहानयों का सबसे बड़ा डिजटल भंडार” तैयार कर सके — भारत की अनंत पहचान का एक जीवंत, विकसित होता चत्रण।

 

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