मान कषाय से मुक्ति के लिए अहंकार छोड़ना जरूरी : मुनि संवेगरत्न सागर
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में मंगलवार को धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने मान कषाय पर विजय पाने का संदेश दिया। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग समझाया।
मुनिश्री ने कहा कि अहंकारी व्यक्ति के लिए सुख-दुख का आधार भी उसका अहम ही बन जाता है। जहां उसके अहम की पुष्टि होती है, उसे सुख महसूस होता है और जहां अहम की उपेक्षा होती है, वही उसके लिए दुख बन जाता है। यही स्थिति धीरे-धीरे मान ज्ञान की परंपरा को मजबूत करती जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि किसी के गुणों की प्रशंसा करना शिष्टाचार है, लेकिन उन गुणों को अपने लिए सोचने लगना मान ध्यान है। व्यक्ति के भीतर यह भाव जितना गहरा होता जाता है, उतना ही वह आत्मचिंतन से दूर होता जाता है।
‘ऐसा गुरु चाहिए जो हमारी प्रशंसा करे’—यह सोच मान कषाय को बढ़ाती है
मुनिश्री ने कहा कि आज व्यक्ति को गुरु तो चाहिए, लेकिन अपनी पसंद और अनुकूलता के अनुसार। ऐसा गुरु नहीं चाहिए जो उसकी भूल बताए, बल्कि ऐसा गुरु चाहिए जो उसकी प्रशंसा करे। यही धारणा मान ध्यान को पोषित करती है।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु और शिष्य का संबंध भव विस्तार के लिए नहीं, बल्कि भव सुधार के लिए होता है। गुरु जब शिष्य की भूल बताते हैं तो उसका उद्देश्य उसे नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उसका सुधार करना होता है। यदि शिष्य में गुरु की सीख स्वीकार करने की पात्रता नहीं रही और गुरु की ओर से भी भूल सुधार की रुचि समाप्त हो गई, तो व्यक्ति भव-भव में भटकता रह सकता है।
गुरु की शरण में ही मान कषाय का अंत
मुनिश्री ने कहा कि हृदय में स्थापित मान कषाय को हटाना होगा। इसकी जड़ मान ध्यान में होती है, जो लंबे समय से व्यक्ति के भीतर गहराई तक जमी रहती है। इससे विजय पाने के लिए जीवन में गुरु पद की स्थापना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि गुरु भगवंत के सानिध्य और उनकी शरण में ही मान कषाय का अंत संभव है। व्यक्ति को मान ध्यान से पीछे हटना होगा। गुरु ही सन्मार्ग का रास्ता बताते हैं और उनके मार्गदर्शन में चलकर ही मनुष्य अहंकार एवं मान ध्यान की परंपरा से बाहर निकलकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।