छत्तीसगढ़ / रायपुर

माया ध्यान जीव को संसार में उलझाकर मोक्ष से करता है दूर : मुनिश्री संवेगरत्न सागर*

रायपुर। माया कषाय जीव को संसार में उलझाए रखकर मोक्ष मार्ग से विमुख कर देता है। यह इतना महाभयंकर है कि इसके प्रभाव में जीव कैवल्यज्ञान की प्राप्ति से भी दूर होता जाता है। माया ध्यान का आलंबन लेकर जीव बार-बार संसार के बंधनों में फंसता है। ये बातें विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने शनिवार को कही।


धर्मसभा में मुनिश्री ने आचार्य श्री वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से माया कषाय के स्वरूप और प्रभाव को समझाया। मुनिश्री ने कहा कि माया छल, कपट और प्रपंच का रूप है। इसके प्रभाव में जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर सांसारिक उपलब्धियों और तुच्छ विषयों में उलझा रहता है।

 *तुच्छ बल का ध्यान कराती है माया* 

मुनिश्री ने कहा कि माया उच्च बल की अपेक्षा तुच्छ बल का ध्यान करती है। जीव के भीतर आत्मिक शक्ति मौजूद है, लेकिन माया के प्रभाव में वह उसे पहचानने के बजाय क्षणिक सांसारिक सुख और उपलब्धियों को महत्व देता है। यही प्रवृत्ति उसे कर्मबंधनों में बांधती जाती है।

मुनिश्री ने कहा कि माया के कारण व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार करने से बचता है। इससे आत्मआलोचना और प्रायश्चित का भाव कमजोर होता है। आत्मशुद्धि के लिए अपनी भूलों को पहचानना और उनका प्रायश्चित करना जरूरी है।

 *माया बढ़ाती है दूसरे कषाय* 

मुनिश्री ने कहा कि माया के प्रभाव में क्रोध, मान, मोह और लोभ जैसे कषाय भी बढ़ते जाते हैं। जीव इन कषायों के चक्र में फंसकर अपनी सहजता और सरलता खो देता है। माया मन की शांति छीनने के साथ व्यक्ति को अध्यात्म से भी दूर करती है।

मुनिश्री ने कहा कि माया ध्यान से बचने के लिए आत्मचिंतन, संयम और सरलता जरूरी है। जीव जब अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और कषायों से दूरी बनाता है, तभी आत्मशुद्धि और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
 
 

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