जलवायु लक्ष्यों के लिए 10 अरब डॉलर से जुटेंगे 50 अरब डॉलर: CEEW-टाटा संस
नई दिल्ली । भारत को 2030 तक बिजली, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों में कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए करीब 500 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। इस लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए 10 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी (कैटेलिटिक कैपिटल) से 50 अरब डॉलर का ब्लेंडेड फाइनेंस जुटाया जा सकता है। इससे शेष निवेश के लिए व्यावसायिक पूंजी आकर्षित करने का रास्ता खुल सकता है। यह आकलन काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के ग्रीन फाइनेंस सेंटर और टाटा संस की संयुक्त रिपोर्ट ‘ब्लेंडेड फाइनेंस फॉर इंडियाज क्लाइमेट गोल्स’ में किया गया है।
2030 तक तीन प्रमुख क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर की जरूरत
रिपोर्ट के अनुसार, बिजली, उद्योग और परिवहन क्षेत्र भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। इन क्षेत्रों के डीकार्बनाइजेशन के लिए 2030 तक कम कार्बन उत्सर्जन वाली 20 तकनीकों में निवेश की आवश्यकता होगी।
अनुमानित निवेश का क्षेत्रवार विवरण इस प्रकार है:
बिजली और अक्षय ऊर्जा: 198 अरब डॉलर
ग्रीन हाइड्रोजन: 115 अरब डॉलर
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी: 187 अरब डॉलर
रिपोर्ट का आकलन है कि कुल निवेश का 10 प्रतिशत यानी 50 अरब डॉलर ब्लेंडेड फाइनेंस के माध्यम से जुटाने से इन तकनीकों में निवेश का ट्रैक रिकॉर्ड तैयार हो सकता है। इससे आगे चलकर शेष राशि जुटाने में व्यावसायिक निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
एक डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी से जुटेंगे पांच डॉलर
ब्लेंडेड फाइनेंस में सार्वजनिक या परोपकारी स्रोतों से मिलने वाली उत्प्रेरक पूंजी का इस्तेमाल निजी और व्यावसायिक निवेश को आकर्षित करने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 50 अरब डॉलर का ब्लेंडेड फाइनेंस जुटाने के लिए करीब 10 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत हो सकती है।
इस मॉडल में उत्प्रेरक पूंजी का प्रत्येक एक डॉलर बाजार की शर्तों पर उपलब्ध चार डॉलर की व्यावसायिक पूंजी के साथ जुड़कर कुल पांच डॉलर का निवेश जुटाने में मदद करेगा। इसे पांच गुना लीवरेज मल्टीपल कहा गया है।
सौर ऊर्जा में ज्यादा, ग्रीन हाइड्रोजन में कम लीवरेज
रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग तकनीकों के लिए उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत उनकी तकनीकी और आर्थिक परिपक्वता पर निर्भर करती है। परिपक्व तकनीकों में निवेश का जोखिम अपेक्षाकृत कम होने से निजी पूंजी आकर्षित करना आसान हो सकता है, जबकि शुरुआती अवस्था की तकनीकों को अधिक सहायता की जरूरत पड़ती है।
तकनीकवार अनुमानित लीवरेज मल्टीपल और उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत इस प्रकार है:
सौर ऊर्जा: 35 गुना लीवरेज मल्टीपल
ग्रीन हाइड्रोजन: 2 गुना लीवरेज मल्टीपल
रिपोर्ट में 2030 तक बिजली और अक्षय ऊर्जा के लिए 1.5 अरब डॉलर, ग्रीन हाइड्रोजन के लिए 5.9 अरब डॉलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए 2.7 अरब डॉलर की उत्प्रेरक पूंजी की जरूरत बताई गई है।
शुरुआती जोखिम उठाने वाली पूंजी जरूरी: एन. चंद्रशेखरन
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने कहा कि भारत को औद्योगीकरण, शहरीकरण और आर्थिक समृद्धि के साथ डीकार्बनाइजेशन की दिशा में भी आगे बढ़ना है। इसके लिए ऊर्जा प्रणालियों, उद्योगों और परिवहन नेटवर्क में बड़े निवेश की जरूरत होगी।
उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक वित्त से इस जरूरत को पूरा करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऐसी पूंजी की जरूरत है, जो शुरुआती जोखिम उठाने के लिए तैयार हो और दीर्घकालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए निवेश करे। उनके अनुसार, उपयुक्त वित्तीय ढांचे के जरिए ब्लेंडेड फाइनेंस भारत के जलवायु लक्ष्यों, ऊर्जा सुरक्षा और सतत आजीविका को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।
नेशनल ग्रीन फाइनेंस इंस्टीट्यूशन बनाने का प्रस्ताव
CEEW ग्रीन फाइनेंस सेंटर के निदेशक गगन सिद्धू ने कहा कि भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए वित्तीय प्रणाली को बड़े पैमाने पर निवेश जुटाने के अनुकूल बनाना जरूरी है। उन्होंने ब्लेंडेड फाइनेंस को कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों के लिए पूंजी जुटाने का एक संभावित माध्यम बताया।
रिपोर्ट में इसके लिए नेशनल ग्रीन फाइनेंस इंस्टीट्यूशन स्थापित करने का प्रस्ताव दिया गया है। यह संस्था सरकारों, दानदाता संस्थाओं और विकास से जुड़े हितधारकों से उत्प्रेरक पूंजी जुटाकर ब्लेंडेड फाइनेंस के माध्यम से विभिन्न परियोजनाओं तक पहुंचा सकती है।
रिपोर्ट में घरेलू दानदाता संस्थाओं की पूंजी का उपयोग बढ़ाने और अनुकूल नीतिगत एवं नियामकीय वातावरण तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।
भारत में ब्लेंडेड फाइनेंस का पिछला अनुभव
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 से 2022 के बीच भारत में ब्लेंडेड फाइनेंस से जुड़े 5.6 अरब डॉलर के लेन-देन दर्ज किए गए, जो वैश्विक बाजार का 3.4 प्रतिशत थे। इनमें उत्प्रेरक पूंजी की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत थी।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए जरूरी निवेश जुटाने में ब्लेंडेड फाइनेंस की भूमिका बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए शुरुआती जोखिम उठाने वाली पूंजी, निजी निवेश को आकर्षित करने वाले वित्तीय ढांचे और एक प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होगी।