संस्कृति
अगर आपके घर या आस-पास अचानक उग जाए Bel Patra का पौधा,तो जाने क्या है इसका इशारा…
हिंदु धर्म में Bel Patra का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व है. यह आदि-अनंत काल से हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है. बेलपत्र भगवान शिव को अतिप्रिय होता है और उनको अर्पित किया जाता है. खासकर सोमवार के दिन, महाशिवरात्रि में, सावन के महीने में इसका विशेष महत्व होता है. Bel Patra का पौधा अगर आपके घर के आस-पास या द्वार पर उग आए तो इसे बहुत शुभ माना गया है.
आज इस आर्टिकल में जानते हैं कि कैसे यह शुभ है. इससे कौन से सकारात्मक संकेत मिले हैं और यह संकेतों का प्रतीक है.
नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा करता है Bel Patra
Bel Patra से आस-पास का वातावरण शुद्ध होता है, इतना ही नहीं इससे नकारात्मकता को दूर भागती है. यानी की इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. अगर, बेलपत्र का पौधा घर के प्रवेश द्वार पर उगता आता है, तो इससे शांति और घर का वातावरण संतुलित, सौहाद्रमय होता है. परिवार किसी भी प्रकार की विपत्ति से सुरक्षित रहता है.
शुगर कंट्रोल में मददगार Bel Patra
हर पौधे में कुछ न कुछ औषधिगुण होते हैं, मगर Bel Patra की बात अलग है. यह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है. मौजूदा समय में लोग इसे खा रहे हैं. बताया यह जा रहा है कि इससे शुगर कंट्रोल रहती है.
समृद्धि का प्रतीक
अगर, बेलपत्र का पौधा घर के आंगन, या प्रवेश द्वार पर उग रहा है तो यह सुख, समृद्धि और उन्नति के शुभ संकेत हैं. यह पौधा इन सबका प्रतीक है.
भगवान शिव का आशीर्वाद
Bel Patra को धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. इसे पवित्र माना गया है, इसलिए यह भगवान शिव को अर्पित किया जाता है. इसकी उपस्थिति भोलेनाथ का आशीर्वाद है. इसलिए मान्यता है कि हर सोमवार को भगवान शिव को एक Bel Patra चढ़ाना चाहिए. इससे उनकी कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है. साथ ही व्यक्ति कामयाब होता है. जीवन में कभी भी निराशा नहीं आती है. वास्तुशास्त्र में भी बेलपत्र को शुभ माना गया है. क्योंकि यह पौधा ऊर्जा संतुलित करता है. यह पौधा सभी वास्तु दोष को निवारण है.
Lakshmi Narayan Temple : लक्ष्मी नारायण का 400 वर्षों से अधिक पुराना मंदिर, इस मंदिर के रहस्य कर देंगे हैरान
जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर सोनो प्रखंड के माहेश्वरी पंचायत के महेश्वरी गांव स्थित बाबा लक्ष्मी नारायण मंदिर अपने स्थापना काल से लेकर आज तक यानी 400 वर्षों से भी अधिक समय से असीम आस्था का केंद्र बना हुआ है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां भव्य तरीके से पूजा अर्चना करके बाबा लक्ष्मी नारायण का वार्षिकोत्सव मनाया जाता है, जिसे अहोरात्रि भी कहा जाता है। इस दिन यहां लक्ष्मी नारायण की पूजा अर्चना और दर्शन के लिए बिहार, झारखंड,उत्तर प्रदेश, बंगाल समेत आधा दर्जन से अधिक राज्य के श्रद्धालुओं का भारी तादाद में जमावड़ा लगता है। यहां लाखों लोगों की भीड़ जमा होती है।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं द्वारा इच्छित मनोकामना की पूर्ति होने और किसी मनोकामना को लेकर या अपने परिजनों की सुख समृद्धि को लेकर चावल, गुड़, घी और दही के मिश्रण से तैयार किया हुआ गुलगुला, पुआ तथा तुलसी का पत्ता नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। इस दिन सूर्योदय के पूर्व महिलाओं द्वारा चूल्हे पर रसोई में भोजन तैयार किया जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही मंदिर परिसर के काफी ऊंचा ध्वज गाड़ा जाता है और इस ध्वज को 24 घंटा के बाद ही उखाड़ा जाता है। ध्वज उखाड़े जाने के बाद लोगों के घरों में चूल्हा पर फिर से भोजन पकता है।
पुजारी चंद्रकांत पांडे, महेश पांडे,शिशुपाल पांडे, शंकर पांडे, पूर्व मुखिया अजय सिंह समेत दर्जनों स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि इस स्थल पर आज से 400 वर्ष पूर्व काफी घना जंगल था और एक ऋषि मुनि यहां वास करके तपस्या करते थे। वह कंदमूल खाकर प्रत्येक दिन अपना जीवनयापन करते थे। उनके सिर में बड़ी-बड़ी जटाएं थी और वह इस जटा में भगवान शालिग्राम को रखते थे। वह ऋषि कलोथरा नदी में स्नान करने के दौरान अपनी जटा से प्रत्येक दिन भगवान शालिग्राम को निकालकर और स्नान कराकर नदी के किनारे स्थित पेड़ से पत्ता तोड़कर उस पर रख देते थे।
वह स्नान से निवृत होने के बाद फिर से भगवान शालिग्राम को अपनी जटा में बांध लेते थे। तप करने के दौरान ही उनकी मुलाकात स्थानीय ग्रामीण राम सिंह और राम पांडे से हई। इन दोनों ने ऋषि की भरपूर सेवा की।काफी लंबे अर्से तक वास करने के बाद वह ऋषि जब दूसरी जगह जाने लगे तो उन्होंने राम सिंह और राम पांडे को कोई वर मांगने को कहा।जिस पर इन दोनों ने कहा कि हे महर्षि आपकी जटा में जो शालिग्राम पत्थर है वह आप हमें दे दीजिए। तब ऋषि ने कहा कि यह शालिग्राम पत्थर नहीं है बल्कि स्वयं भगवान लक्ष्मी नारायण हैं और आप लोग सही तरीके से इनकी पूजा अर्चना नहीं कर पाओगे। लेकिन वे दोनों शालिग्राम पत्थर लेने की जिद पर अड़ गए। तत्पश्चात ऋषि ने उन दोनों को नियमपूर्वक भगवान लक्ष्मी नारायण सौंपकर और पूजा की सारी विधि बताकर दूसरी जगह चले गए।
इसके बाद स्थानीय ग्रामीणों ने ऋषि की कुटिया के समीप ही पूरे विधि विधान से एक झोपड़ीनुमा मंदिर बनाकर लक्ष्मी नारायण की स्थापना करके पूजा अर्चना प्रारंभ किया।धीरे धीरे ग्रामीणों ने जन सहयोग से पक्का मंदिर का निर्माण किया,जहां आज भी पूजा अर्चना हो रही है।स्थापना काल से लेकर आज तक बाबा लक्ष्मी नारायण और उनका मंदिर आसपास सहित दूर दराज के लोगों को भी असीम श्रद्धा,भक्ति और आस्था का केंद्र बना हुआ है।
Shani Margi 2024: इन राशियों के लिए भाग्योदय कारक होने वाला है शनि का मार्गी होना
वर्तमान में शनि अपनी वक्र गति से चल रहे हैं, 15 नवम्बर को शनि वक्री से मार्गी हो जाऐंगे। 15 नवम्बर 2024 से शनि अपनी वक्री चाल का त्याग कर मार्गी हो रहे हैं, जिसके कारण 16 नवम्बर से लोगों को अपने जीवन में परिवर्तन दिखाई देगा। जिनकी जन्मपत्री में शनि महत्वपूर्ण भूमिका में है, अथवा गोचर से अनुकूल हैं, उन्हें शनि कृपा प्राप्त होगी, जिनके लिए शनि प्रतिकूल हैं, उन्हें शनि का उपाय अवश्य करना चाहिए।
इन राशियों के लिए भाग्योदय कारक है शनि मार्गी 2024 (Shani Margi 2024) - शनि का मार्गी होना, कुछ राशियों के लिए भाग्योदय कारक है, जिसमें सबसे ज्यादा लाभ मेष राशि को मिलने वाला है क्योंकि गोचर में मेष राशि से 11वीं कुम्भ राशि में स्थित शनि मार्गी अवस्था में तीव्र गति से इस राशि के जातकों का कल्याण करेंगे। गोचर ज्योतिष के अनुसार 29 मार्च 2025 के अंदर मेष राशि को सबसे ज्यादा लाभ मिलने वाला है। मेष राशि वालों के प्रमोशन की प्रबल सम्भावनाऐं बन रही हैं, उनका रुका हुआ कार्य पूरा होने वाला है, नया वाहन अथवा नया मकान खरीदने का प्रबल योग जन्मपत्री में चतुर्थ भाव के अनुसार बन सकता है।
मेष राशि वालों के लिए नववर्ष 2025 के प्रथम तीन महीने उनके जीवन में विशेष खुशियां लेकर आने वाले हैं, गौरतलब है कि विगत कुछ समय से वक्री होने के कारण मेष राशि वाले विविध प्रकार के लाभों से वंचित थे, सफलता हाथ आते-आते निकल जा रही थी, लेकिन अब शनि के मार्गी होने से मेष राशि वालों का भाग्योदय होने से कोई नहीं रोक सकता है। अगर आपकी जन्मपत्री में अन्य ग्रह योग बने हुए हैं तो गोचर का शनि आपके लिए फायदेमंद है। मेष राशि के साथ-साथ धनु राशि तथा कन्या राशि वालों के लिए भी शनि का मार्गी होना अत्यंत शुभ है, धनु राशि वालों के लिए शनिदेव पराक्रम में वृद्धि कराएंगे, कन्या राशि वालों को स्वास्थ्य सुख एवं उनके शत्रुओं का नाश कर सुख सुविधा प्रदान करेंगे।
कार्तिक पूर्णिमा पर गौरी समेत धन योग का दुर्लभ संयोग, मेष, तुला समेत इन 6 राशियों का नए साल 2025 तक मिलेंगे कई लाभ
कार्तिक पूर्णिमा का पर्व 15 नवंबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा और पुराणों में इस दिन को स्नान, जप-तप, व्रत की दृष्टि से मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। कार्तिक पूर्णिमा पर इस बार गजब के संयोग बन रहे हैं, जिसका फायदा कई राशियों को नए साल यानी साल 2025 तक मिलेगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा पर चंद्रमा मेष राशि में होकर मंगल के साथ राशि परिवर्तन योग बनाएंगे, साथ ही मंगल और चंद्रमा के एक दूसरे से चतुर्थ दशम होने से धन योग भी बनेगा। इसके साथ ही चंद्रमा और गुरु के एक दूसरे से द्विद्वाश योग होने से सुनफा योग भी बनेगा। वहीं शनिदेव अपनी मूल त्रिकोण राशि में विराजमान हैं इसलिए इस दिन शश राजयोग भी बन रहा है, जो फिर 30 साल के बाद ही बनेगा। कार्तिक पूर्णिमा पर बन रहे शुभ योग का दुर्लभ संयोग कई राशियों के लिए नए साल तक धन, सुख और सौभाग्य में वृद्धि दायक रहेगा और परिवार में सुख-शांति और प्रतिष्ठा बनी रहेगी। आइए जानते हैं कार्तिक पूर्णिमा पर बन रहे शुभ योग का फायदा किन किन राशि वालों को मिलेगा
कार्तिक पूर्णिमा पर बन रहे शुभ योग से मेष राशि वालों के जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। इस राशि के जो लोग किराए के घर पर रहते हैं, उनका खुद का घर लेने का सपना पूरा हो सकता है। शुभ योग के दुर्लभ संयोग से जीवन में चल रही समस्याओं से मुक्ति मिलेगी और धन प्राप्ति के योग बन रहे हैं। इस दौरान परिवार में कोई शुभ व मांगलिक कार्यक्रम का आयोजन हो सकता है। शुभ योग के प्रताप से मेष राशि वालों की इस दौरान कई इच्छाएं पूरी होंगी और धर्म कर्म के कार्यों में मन लगेगा।
श्री रामलला सरकार का दिव्य श्रृंगार,
12 November. अयोध्या में विराजमान संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी प्रभु श्री रामलला का श्रृंगार प्रतिदिन भव्य रूप में होता है. रोजाना भगवान श्री राम भक्तों को अलग-अलग रूप में दर्शन देते हैं. उनकी फूलों की माला भी दिल्ली से मंगाई जाती है.
रामलला की पहली आरती सुबह 6.30 बजे होती है. रामलला को जगाने से पूजन शुरू होता है. इसके बाद उन्हें लेप लगाने, स्नान करवाने से लेकर वस्त्र पहनाया जाता है.
हर दिन और मौसम के हिसाब से अलग-अलग वस्त्र पहनाए जाते हैं. गर्मियों में सूती और हल्के वस्त्र तो जाड़े में स्वेटर और ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं.
दोपहर 12 बजे भोग आरती होती है और साढ़े सात बजे संध्या आरती होती है. इसके बाद रामलला को 8.30 बजे शयन करवाया जाता है. रामलला के दर्शन 7.30 बजे तक ही किए जा सकते हैं.
रामलला को चार समय भोग लगता है. रामलला को हर दिन और समय के हिसाब से अलग-अलग व्यंजन परोसे जाते हैं. ये व्यंजन राम मंदिर की रसोई में बनते हैं. सुबह की शुरुआत बाल भोग से होती है.
इसी कड़ी में कार्तिक माह, शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि विक्रम संवत् 2081 (12 नवंबर, मंगलवार) को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र अयोध्या धाम में ब्रह्मांड नायक श्री रामलला सरकार की शुभ अलौकिक श्रृंगार हुआ.
शनिवार 9 नवंबर से लग रहा मृत्यु पंचक, जानें इस दिन क्या ना करें और शनि के अशुभ प्रभाव से बचने के उपाय
ज्योतिष शास्त्र में पंचक काल को अशुभ समय माना गया है और इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है। पंचक काल को अशुभ और हानिकारक नक्षत्रों का योग माना गया है और जब पंचक शनिवार के दिन से शुरू होता है तो उसको मृत्यु पंचक के नाम से जाना जाता है। इस बार शनिवार 9 नवंबर से पंचक शुरू हो रहे हैं और 13 नवंबर दिन बुधवार तक रहेंगे। साथ ही शनिवार को भद्रा का साया भी रहने वाला है। ऐसे में शनि की महादशा और शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए कुछ उपाय भी कर सकते हैं।
पंचक काल पांच दिन का होता है, दरअसल चंद्रमा एक राशि में ढाई दिन तक रहते हैं और जब वह कुंभ और मीन राशि में संचार करते हैं तो यह ढाई ढाई दिन मिलकर पांच दिन के हो जाते हैं। इस दौरान पांच दिनों में धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्र होते हैं, इनको अशुभ नक्षत्र माना जाता है। इन पांच नक्षत्रों का समूह से बनने वाला योग पंचक कहलाता है।
शनिवार से शुरू होने वाले पंचक को मृत्यु पंचक कहते हैं। जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि अशुभ दिन से शुरू होने वाला पंचक मृत्यु के बराबर जीवन में परेशानी दिलाता है इसलिए इन पांच दिनों में कोई भी अशुभ व जोखिम भरे कार्य करने से बचना चाहिए। इस अशुभ काल की चपेट में आने से दुर्घटना, चोट, विवाद, कानूनी मामले आदि होने का खतरा बना रहता है।
Gopashtami 2024: गोपाष्टमी पर इस विधि से करें पूजा, नोट करें भोग एवं शुभ मुहूर्त
नई दिल्ली। सनातन धर्म में गोपाष्टमी पर्व का बड़ा धार्मिक महत्व है। यह दिन भगवान कृष्ण की पूजा के लिए समर्पित है। इस शुभ लोग दिन पर लोग, गायों और बछड़ों की भी पूजा करते हैं, क्योंकि वे भगवान कृष्ण को बेहद प्रिय हैं। यह दिन मुख्य रूप से मथुरा, वृन्दावन और ब्रज में मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, गोपाष्टमी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। इस साल यह 9 नवंबर 2024 को मनाई जाएगी, तो आइए इस दिन (Gopashtami 2024 Date) से जुड़ी प्रमुख बातों को जानते हैं।
Guruwar ke Upay : आज का गुरुवार बेहद खास, गुरु चंद्रमा का नवम पंचम योग, शुभ लाभ के लिए कर लें गुरु ग्रह के 4 सरल उपाय
गुरु इस समय वक्री अवस्था में चल रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, गुरु की वक्री अवस्था को अनुकूल नहीं माना गया है। गुरु के वक्री होने से व्यक्ति का मन धर्म कर्म के कार्यों में कम लगता है। साथ ही ऐसे लोगों को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, राशि के अनुसार, सभी पर अलग -अलग प्रभाव होता है लेकिन, यदि कार्तिक मास के गुरुवार के दिन गुरु के संबंधित कुछ आसान उपाय कर लिए जाएं तो इसका प्रभाव कम किया जा सकता है। कार्तिक मास के किसी भी गुरुवार से आप ये उपाय करना शुरू कर सकते हैं कम से कम 7 गुरुवार आपको यह उपाय करने हैं और आपको प्रभाव दिखाई देना शुरू हो जाएगा। साथ ही आज छठ महापर्व भी है साथ ही आज गुरु और चंद्रमा का नवपंचम योग भी बन रहा है। ऐसे में आज से गुरु ग्रह को मजबूत करने के ये उपाय आपको अधिक लाभ दिलाएंगे।
गुरुवार के उपाय
1) कार्तिक मास के गुरुवार से अगले 7 गुरुवार तक लगातार 250 ग्राम चने की दाल और उतना ही गुड़ लेकर गाय को खिलाएं। यदि आपको गाय नहीं मिलती है तो आप यह सामग्री किसी पवित्र नदी में भी प्रवाहित कर सकते हैं। लेकिन, इस बात का ध्यान रखें कि जो उपाय आप पहले गुरुवार करेंगे यानी गाय को चने गुड़ खिलाना या नदी में प्रवाहित करना कहीं आपको अगले 7 गुरुवार करना होगा।
2) कार्तिक मास के किसी भी गुरुवार आप चाहें तो यह सरल उपाय भी कर सकते हैं। गुरुवार के दिन किसी भी मंदिर में जाकर धार्मिक पुस्तक का दान करें। ऐसा करने से आपको गुरु के वक्री प्रभाव से आपको राहत मिलेगी। ये उपाय आपको 5 गुरुवार तक करना। पुस्तक की संख्या आप अपने सामर्थ के अनुसार तय कर सकते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की जीत से नास्त्रेदमस की कौन-सी भविष्यवाणी हुई सच, जानें भारत के बारे में नास्त्रेदमस की 4 विशेष भविष्यवाणियां
डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सत्ता पर वापसी कर ली है। ट्रंप ने डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को हराकर दूसरी बार जीत हासिल की। डोनाल्ड ट्रंप की जीत के साथ ही तमाम राजनीति चर्चाओं के बीच भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों पर एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई है। फ्रांस के महान भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की सदियों पहले की गई भविष्यवाणी को अमेरिका की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। 1555 में 'The Prophecies' (Les Prophéties) नाम से नास्तेदमस की एक किताब प्रकाशित हुई थी, जिसे नास्तेदमस ने 1503 के आसपास लिखा था। इस किताब में भारत सहित देश-दुनिया के बारे में कई भविष्यवाणियां की गई थीं। इनमें से काफी भविष्यवाणियां सच भी हो चुकी हैं।
आइए, एक नजर डालते हैं नास्त्रेदमस की कौन-सी भविष्यवाणी को ट्रंप से जोड़ा जा रहा है और भारत के लिए नास्त्रेदमस ने कौन-सी बड़ी भविष्यवाणियां की है।e Prophecies' किताब में नास्त्रेदमस में विश्व की महाशक्ति का उल्लेख किया था। इस किताब के अनुसार महाशक्ति का नया राजा उम्र के अंतिम पड़ाव पर सिंहासन पर दूसरी बार कब्जा संभालेगा। अब जाहिर-सी बात है कि 1555 में एक देश के रूप में अमेरिका का गठन नहीं हुआ था। अमेरिका का गठन 1776 में हुआ था लेकिन नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी में महाशक्ति का जिक्र किया गया है और वर्तमान समय के अनुसार अमेरिका महाशक्ति देशों में से एक है। वहीं, अमेरिका में हाल में चुनाव भी हुए हैं, जिसमें ट्रंप की उम्र वर्तमान में 78 साल है। ऐसे में नास्त्रेदमस की सदियों पहले की गई भविष्यवाणी में अमेरिका चुनाव और ट्र्ंंप की जीत की झलक दिखाई देती है।
Chhath Puja 2024, Sun Rise Time : उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ छठ महापर्व का समापन, जानें कल आपके शहर में कब होगा सूर्योदय
छठ महापर्व का चौथा दिन 8 नवंबर शुक्रवार को है। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। छठ के आखिरी दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। इसी के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन हो जाएगा। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन सभी छठ व्रती व्रत का पारण करते हैं।
पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 7 नवंबर की मध्यरात्रि 11बजकर 57 मिनट पर होगा। ऐसे में 8 नवंबर को सुबह के समय अगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 8 नवंबर को सूर्योदय का समय सुबह 6 बजकर 38 मिनट पर है।
जानें आपके शहर में कब होगा सूर्योदय
- दिल्ली में सूर्योदय का समय 6 बजकर 38 मिनट
- पटना में सूर्योदय का समय 6 बजकर 3 मिनट
- मुजफरपूर सूर्योदय का समय 6 बजकर 2 मिनट
- गया सूर्योदय का समय 6 बजकर 1 मिनट
- भागलपुर सूर्योदय का समय 5 बजकर 59 मिनट
- मोतीहारी सूर्योदय का समय 6 बजकर 4 मिनट
- नालंदा सूर्योदय का समय सुबह 6 बजे
- लखनऊ सूर्योदय का समय 6 बजकर 16 मिनट
- वाराणसी सूर्योदय का समय 6 बजकर 5 मिनट
- मुंबई सूर्योदय का समय 6 बजकर 39 मिनट
- नोएजा सूर्योदय का समय 6 बजकर 31 मिनट
छठ में सूर्योदय के समय अर्घ्य देने का महत्व
मान्यताओं के अनुसार, सूर्योदय होते समय अर्घ्य देने से सुख समृद्धि का वरदान मिलता है। साथ ही संतान प्राप्ति की मनोकामना और संतान की रक्षा का वरदान भी व्यक्ति के मिलता है। साथ ही सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देने से व्यक्ति को सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। छठ महापर्व के आखिरी दिन सूर्योदय के दौरान अर्घ्य देते समय आपको ओम एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते, अनुकंपय माम् भक्तया गृहाणाघ्र्यम् दिवाकर।। इस मंत्र का जप करना है।
छठ पूजा में आखिर डूबते सूर्य को क्यों दिया जाता है अर्घ्य, जानें सूर्यास्त और सूर्योदय का समय
लोक आस्था के महापर्व छठ के तीसरे दिन यानी व्रती अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके एक दिन पहले बुधवार को खरना करके 36 घंटे के व्रत की शुरुआत हो गई है। छठ के चारों दिन का अलग-अलग महत्व होता हैं। छठ के तीसरे दिन यानी आज शाम को व्रती घाटों पर आकर कमर तक पानी में उतर कर सूर्य को संध्या अर्घ्य देंगे। आज सूर्यास्त का समय शाम को 5 बजकर 48 मिनट पर होगा। इसके बाद श्रद्धालु कल यानी शुक्रवार को सप्तमी पर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत खोलेंगे और कल सुबह 6 बजकर 48 मिनट पर सूर्योदय होगा। सभी लोग पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं और छठी मैया की पूजा कर रहे हैं।
खरना से शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला व्रत
छठ पर्व के दूसरे दिन खरना पर घर-घर विशेष प्रसाद बनाया गया और इसी के साथ 36 घंटे लगातार निर्जला व्रत की शुरूआत भी हो गई है। इस दौरान मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर बनाई गई। इसके लिए पीतल के बर्तन का प्रयोग किया जाता है और इस भोजन में बहुत ही शुद्धता और पवित्रता का ध्यान रखना पड़ता है। खीर के अलावा गुड़ की अन्य मिठाई, ठेकुआ और लड्डू आदि भी बनाए जाते हैं। इसके बाद पूरा परिवार ने व्रत व्यक्ति से आशीर्वाद लिया जाता है। साथ ही सुहागन महिलाएं व्रती महिलाओं से सिंदूर लगवाती हैं।
आज व्रती डूबते सूर्य को देंगे अर्घ्य
छठ का पर्व जात-पात और अमीर-गरीब का भेद को खत्म करता है और इस पर्व में हर कोई बराबर होता है। छठ पर्व के तीसरे दिन शाम को भगवान भगवान भास्कर को पहला अर्घ्य दिया जाएगा, जिसकी वजह से हर जगह भक्ति का माहौल बना हुआ है। इसके बाद 8 नवंबर को उदीयमान भगवान भास्कर को दूसरा अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण और चार दिवसीय पर्व का समापन होगा। आज व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य अर्घ्य देने घाट पर पहुंचेंगी, इसको लेकर हर जगह तैयारियां पूरी हो गई हैं। सूर्य को अर्घ्य देने से बच्चों का जीवन भी सूर्य के समान चमकता है और जीवन में मान सम्मान और यश की भी प्राप्ति होती है।
Chhath Vrat Paran Vidhi : छठ महापर्व का आखिरी दिन बेहद खास, जानें व्रत पारण की विधि और क्या करें क्या न करें
छठ महापर्व का समापन 7 नवंबर शुक्रवार के दिन होगा। छठ महापर्व की शुरुआत कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से होती है और यह चार जिन धूमधाम के साथ उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इसका समापन हो जाता है। 8 नवंबर शुक्रवार के दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही छठ महापर्व का समापन हो जाएगा। आइए जानते हैं छठ महापर्व के आखिरी दिन क्या करें क्या न रें। साथ ही जानें छठ महापर्व के आखिरी दिन व्रत का पारण कैसे करें।
छठ व्रत का पारण कैसा करें
छठ महापर्व के आखिरी दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन घाट पर पूजन किया जाता है। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दें। इसके बाद छठी माता कोअर्पित किया गया प्रसाद सभी को बांटें। घाट पर पूजन करने के बाद अपने घर के बड़े बुजुर्गों से आशीर्वाद लें। छठी माता को आप जो प्रसाद भेट करें फिर उस प्रसाद को सभी लोगों को बांट दें। इस बात का खास ख्याल रखें की व्रत का पारण करते हुए मसालेदार भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। व्रत का पारण के लिए आपको पूजा के दौरान चढ़ाए गए प्रसाद जैसे ठेकुआ मिठाई आदि से ही व्रत का पारण करना चाहिए।
व्रत पारण से पहले क्या करें
छठ के व्रत का पारण करने से पहले सूर्योदय से पहले का स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें।
इसके बाद सूर्योदय से पहले ही पारण के लिए प्रसाद तैयार कर लें। प्रसाद में ठेकुआ, फल, दूध आदि चीजें शामिल की जाती हैं।
देवगुड़ी के संरक्षण-संवर्धन से सांस्कृतिक धरोहर की हो रही है पुनर्स्थापना
लक्ष्मीकांत कोसरिया (उप संचालक, जनसम्पर्क)
देवगुड़ी को संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उन स्थलों के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष प्रयासों पर जोर दिया है। उन्होंने संबंधित विभागों को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए है। देवगुड़ी के संरक्षण से न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संजोने में मदद मिलेगी बल्कि इससे क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
छत्तीसगढ़ में सैकड़ों देवगुड़ी वनसमृद्ध जनजातीय क्षेत्रों में स्थित हैं। ये स्थल जनजातीय समुदायों द्वारा पूजनीय हैं एवं राज्य की सांस्कृतिक धरोहर और पारिस्थितिक संपदा का अभिन्न हिस्सा हैं। स्थानीय जनजातीय देवताओं के निवास स्थल होने के कारण ये पारंपरिक अनुष्ठानों और त्योहारों का केंद्र हैं, साथ ही ये जैव विविधता के अनूठे केंद्र भी माने जाते हैं।
छत्तीसगढ़ की देवगुड़ी में भंगाराम, डोकरी माता गुड़ी, सेमरिया माता, लोहजारिन माता गुड़ी, मावली माता गुड़ी, माँ दंतेश्वरी गुड़ी और कंचन देवी गुड़ी जैसे नाम शामिल हैं। ये सभी देवगुड़ी स्थानीय जनजातीय समुदायों की आस्थाओं में विशेष स्थान रखती हैं और प्रत्येक का अपना विशिष्ट महत्व है।
छत्तीसगढ़ वन विभाग संयुक्त वन प्रबंधन, कैंपा, छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड एवं राज्य वन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से इन पवित्र देवगुड़ियों के संरक्षण में सक्रिय रूप से प्रयासरत है। अब तक विभाग द्वारा 1,200 से अधिक देवगुड़ी स्थलों का दस्तावेजीकरण और संरक्षण किया जा चुका है, ताकि इन पारिस्थितिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख व्ही. श्रीनिवास राव, आईएफएस ने कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और वन मंत्री केदार कश्यप छत्तीसगढ़ के वनसमृद्ध जनजातीय क्षेत्रों से संबंध रखते हैं। उनके नेतृत्व में वन विभाग देवगुड़ी स्थलों के संरक्षण के लिए समर्पित है। ये प्रयास राज्य में सतत् वन प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के हमारे व्यापक मिशन के अनुरूप हैं।
देवगुड़ी के उपवन पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। ये दुर्लभ, संकटग्रस्त, और स्थानीय वनस्पति प्रजातियों का आश्रय स्थल हैं, जहाँ इनका संरक्षण भी सुनिश्चित होता है। ये स्थल मृदा अपरदन को रोकने में सहायक भी हैं। जनजातीय समुदायों का मानना है कि इन पवित्र स्थलों की रक्षा देवताओं द्वारा की जाती है, इसलिए यहाँ पेड़ काटना, शिकार करना या किसी जीव को हानि पहुँचाना वर्जित है। इन उपवनों से जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान गहराई से जुड़ी हुई है और ये उनकी पारंपरिक प्रथाओं को जीवित रखते हैं। मड़ई, हरेली, और दशहरा जैसे त्योहारों पर यहाँ विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, एवं नवविवाहित जोड़े यहाँ आकर स्थानीय देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
देवगुड़ी स्थलों की पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए वन विभाग द्वारा यहाँ विशेष भूनिर्माण कार्य किए गए हैं, जिनमें पगडंडियों का निर्माण, बाड़बंदी, और पर्यावरण के अनुकूल संरचनाएँ शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष राकेश चतुर्वेदी ने कहा कि वन विभाग स्थानीय जनजातीय के सहयोग से देवगुड़ी के संरक्षण एवं संवर्धन में सक्रिय रूप से प्रयासरत है। इस पहल के अंतर्गत बड़ी संख्या में स्थानीय वनस्पति प्रजातियों का रोपण किया जा रहा है और पारंपरिक त्योहारों का पुनर्जीवन किया जा रहा है।
राज्य जैव विविधता बोर्ड के सदस्य सचिव राजेश कुमार चंदेले आईएफएस ने बताया कि इन उपवनों की जैव विविधता को पुनर्जीवित करने के लिए वन विभाग द्वारा साल, सागौन, बांस, हल्दू, बहेड़ा, सल्फी, आंवला, बरगद, पीपल, कुसुम बेल, साजा, तेंदू, बीजा और कई औषधीय पौधों जैसी देशी प्रजातियाँ लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि ये स्थल सांप, मोर, जंगली सुअर और बंदरों जैसे विविध वन्यजीवों के लिए समृद्ध पारिस्थितिक आवास प्रदान करते हैं। साथ ही जनजातीय समुदायों के बीच गैर विनाशकारी कटाई प्रथाओें को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
राज्य जैव विविधता बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नीतू हरमुख ने बताया कि छत्तीसगढ़ के देवगुड़ी स्थलों को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के लोक जैव विविधता पंजिका में आधिकारिक रूप से पंजीकृत किया जा रहा है। साथ ही इन पवित्र उपवनों की जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करने के लिए शोध कार्य किए जा रहे हैं। हालाँकि, शहरीकरण, परंपरागत विश्वासों में कमी, अतिक्रमण, खरपतवार, पशुओं की चराई, और जलाऊ लकड़ी का संग्रह जैसी चुनौतियाँ इन उपवनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही हैं। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ वन विभाग इनकी जैव विविधता और सांस्कृतिक महत्ता को संरक्षित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
नवंबर में कब मनाई जाएगी लाभ पंचमी, जानिए पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
नई दिल्ली। मान्यता है कि लाभ पंचमी के दिन की गई पूजा से साधक को व्यवसाय आदि में लाभ देखने को मिलता है, और सौभाग्य की वृद्धि होती है। साथ ही इस दिन को किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए भी शुभ माना जाता है। इसलिए इस दिन को लाभ पंचमी के रूप में जाना जाता है। इस दिन खासतौर पर धन की देवी लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसे में चलिए जानते हैं लाभ पंचमी की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त।
लाभ पंचमी शुभ मुहूर्त
कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारंभ 06 नवंबर को मध्य रात्रि 12 बजकर 16 मिटन पर हो रहा है। वहीं इस तिथि का समापन 07 नवंबर को मध्य रात्रि 12 बजकर 41 मिनट पर होगा। इस प्रकार लाभ पंचमी बुधवार, 06 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दौरान पूजा का शुभ मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है -
प्रातः काल लाभ पंचमी पूजा मुहूर्त - सुबह 06 बजकर 37 मिनट से सुबह 10 बजकर 15 मिनट तक
.jpg)
लाभ पंचमी पूजा विधि
- लाभ पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।
- शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश, शिव जी और देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें।
- पूजा में मिठाई और फल आदि अर्पित करें।
- गणेश जी को चंदन, सिंदूर, फूल और दूर्वा अर्पित करें।
- भगवान शिव को बिल्व पत्र, धतूरे के फूल और सफेद वस्त्र अर्पित करें।
- लक्ष्मी जी को हलवा और पूड़ी का भोग लगाएं।
- अंत में आरती करते हुए मां लक्ष्मी से समृद्धि और सफलता के लिए प्रार्थना करें।
.jpg)
क्या है मान्यता
लाभ पंचमी के अवसर पर व्यवसायी लोग अपने बहीखाता और लेखा-जोखा का पूजन करते हैं। नए बहीखाता पर खाता पर शुभ-लाभ और स्वस्तिक बनाकर उनका उद्घाटन किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से आगामी वर्ष में व्यापार में वृद्धि के योग बनते हैं। साथ ही इस दिन कई साधक सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए व्रत भी रखते हैं।
Tulsi Vivah पर करें तुलसी से जुड़े ये उपाय, आर्थिक तंगी होगी दूर, बरसेगी मां लक्ष्मी की कृपा
नई दिल्ली। पंचांग के अनुसार, इस बार तुलसी विवाह का पर्व 13 नवंबर को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से तुसली माता की उपासना करने से जातक को धन लाभ के योग बनते हैं। अगर आप अपने जीवन को खुशहाल बनाना चाहते हैं, तो तुलसी विवाह के दिन इस लेख में दिए गए उपाय जरूर करें। इन उपाय को करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।
तुलसी विवाह शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी 12 नवंबर को है। इसके अगले दिन तुलसी विवाह मनाया जाएगा। हालांकि, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि की शुरुआत 12 नवंबर को शाम 04 बजकर 04 मिनट पर होगी। वहीं, समापन 13 नवंबर को दोपहर 01 बजकर 01 मिनट होगा। उदया तिथि की गणना के अनुसार, 13 नवंबर को तुलसी विवाह मनाया जाएगा।

ब्रह्म मुहूर्त - 05 बजकर 56 मिनट से 05 बजकर 49 मिनट तक
विजय मुहूर्त - दोपहर 01 बजकर 53 मिनट से 02 बजकर 36 मिनट तक
तुलसी के उपाय
अगर आप तुलसी माता का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो तुलसी विवाह के दिन विधिपूर्वक से जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां तुलसी की उपासना करें। कच्चे दूध में तुलसी दल मिलाकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इस समय निम्न मंत्र का पाठ करें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को करने से धन संबंधी समस्या से छुटकारा मिलता है।
तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।
धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।।
लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।
तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।।
अगर आपके विवाह में कोई बाधा आ रही है, तो तुलसी विवाह के दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें और तुलसी माता की पूजा करें। पौधे में केसर मिश्रित दूध चढ़ाएं। माना जाता है कि इस उपाय को करने से जातक को मनचाहा वर विवाह मिलता है और जल्द विवाह के योग बनते हैं।
अगर आप जीवन में आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं, तो इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पत्तों को साफ लाल कपड़े में बांधें। इसे तिजोरी या पर्स में रख लें। मान्यता है कि इस टोटके को करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और जातक को जीवन में धन की कमी नहीं होती है।
आज से हुआ छठ पर्व का शुभारंभ, अपनों को दें नहाय-खाय की शुभकामनाएं
नई दिल्ली। छठ पूजा के दौरान भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा की जाती है। इस पूजा में उगते व डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। माना जाता है कि छठी मैय के विधि-विधान पूर्वक पूजन से साधक को आरोग्यता, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति हो सकती है। इस बार छठ महोत्सव 05 नवंबर से 8 नवंबर तक चलने वाला है। ऐसे में अपने प्रियजनों व मित्रों को नहाय-खाय पर्व की शुभकामनाएं (Chhath Puja 2024 Nahay Khay Wishes) भेजकर उनके लिए इस पर्व को और भी यादगार बना सकते हैं।
नहाय-खाय की शुभकामनाएं
छठ का पर्व आया
अपने साथ खुशियां अपार लाया
सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देने
फिर से एक बार छठ का पर्व आया
हमारी शुभकामनाएं करे स्वीकार
मुबारक हो आपको छठ का त्योहार

ठेकुआ लाओ, लड्डू चढ़ाओ
छठी मैया के गुण गाओ
जय छठी मैया
नहाय खाय की शुभकामनाएं
सात घोड़ों के रथ पर सवार,
भगवान सूर्य आएं आपके द्वार
किरणों से भरे आपका घर संसार
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं
कदुआ भात से होती है पूजा की शुरुआत,
खरना के दिन खाते हैं खीर में गुड़ और भात
सांझ का अर्घ्य करता है जीवन में शुभ शुरुआत,
सुबह के अर्घ्य के साथ पूरी हो आपकी हर मुराद
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं
छठ पर्व सबके जीवन में खुशियां लाए
सबके घर को सुख-संपन्नता और यश से भर दे
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं
खुशियों का त्योहार आया है
सूर्य देव से सब जगमगाया है
खेत खलिहान धन और धान
यूं ही बनी रहे आपकी शान
नहाय खाय की शुभकामनाएं
मंदिर की घंटी, आरती की थाली
नदी के किनारे सूरज की लाली
जिंदगी में आए खुशियों की बहार
शुभ हो आपका छठ का त्योहार
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं
छठ पूजा का पावन पर्व,
करो मिलकर सूर्य देव को प्रणाम,
आपको मिले सुख-समृद्धि अपार.
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं
.jpg)
जो है जगत का पालनहार,
सात घोड़ों की है जिनकी सवारी,
न कभी रुके, न कभी देर करे,
ऐसे हैं हमारे सूर्यदेव,
आओ मिलकर करें इस छठ पर उनकी पूजा,
नहाय खाय 2024 की शुभकामनाएं
छठ पूजा का दिव्य आशीर्वाद आपके जीवन को आनंद,
शांति और समृद्धि से रोशन करें
छठ पूजा व नहाए खाए 2024 की शुभकामनाएं
जल आपकी आत्मा को शुद्ध करें
और सूर्य की किरणें आपके मार्ग में प्रकाश लाएं
नहाय खाय की हार्दिक शुभकामनाएं!
छठ पूजा में छठी मैया को लगाएं इन चीजों का भोग, सुख-समृद्धि में होगी वृद्धि
नई दिल्ली। आज से छठ पर्व की शुरुआत हो गई है। इस पर्व के प्रथम दिन नहाय-खाय की परंपरा को विधिपूर्वक निभाया जाता है। पंचांग के अनुसार, हर साल छठ के त्योहार का प्रारंभ चतुर्थी तिथि से होता है। छठ पूजा के दौरान छठी मैया और सूर्य देव की पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही निर्जला व्रत किया जाता है। पूजा थाली में कई तरह के भोग शामिल किए जाते हैं। मान्यता है कि छठी मैया और सूर्य देव को प्रिय चीजों का भोग लगाने से घर में खुशियों का आगमन होता है। साथ ही परिवार के सदस्यों पर छठी मैया की कृपा सदैव बनी रहती है। आइए इस लेख में जानते हैं कि छठी मैया (Chhath Puja 2024 Bhog List) और सूर्य देव को किन चीजों का भोग लगाना फलदायी माना गया है?
.jpg)
कैसे मनाया जाता है छठ पर्व
हर साल छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय के साथ होती है। इस दिन महिलाएं तालाब या नदी में स्नान करती हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना कर सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके अगले दिन दूसरे दिन खरना पूजा होती है, जिससे व्रत की शुरुआत मानी जाती है। इस व्रत को निर्जला किया जाता है। खरना के दिन गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है। इसके अगले दिन व्रत किया जाता और डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। वहीं, अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है।