छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

इमारती लकड़ी की खुलेआम हो रही होली, वन विभाग की निगरानी व्यवस्था बेअसर

 इमारती लकड़ी की खुलेआम हो रही होली, वन विभाग की निगरानी व्यवस्था बेअसर

कवर्धा 
कबीरधाम जिले के बोड़ला नगर पंचायत, चिल्फी, तरेगांव सहित आसपास के गांवों और राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे संचालित होटलों एवं ढाबों में खुलेआम इमारती लकड़ियों को भट्टियों में झोंका जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि सागौन, साल (सरई) तथा अन्य मिश्रित प्रजातियों की मोटी-मोटी लकड़ियां चूल्हों और भट्टियों की आग में जलती दिखाई दे रही हैं। जिले में वन मंडल और वन विकास निगम जैसी दो-दो महत्वपूर्ण संस्थाएं होने के बावजूद बहुमूल्य इमारती लकड़ियों का इस तरह खुलेआम उपयोग वन संरक्षण व्यवस्था की गंभीर विफलता को उजागर कर रहा है।
बोड़ला नगर पंचायत, चिल्फी, तरेगांव और आसपास के क्षेत्रों में सड़क किनारे स्थित कई होटल एवं ढाबों के बाहर भट्टियों के पास इमारती लकड़ियों का ढेर आसानी से देखा जा सकता है। यह दृश्य किसी दूरस्थ वन क्षेत्र का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों का है, जहां से प्रतिदिन हजारों लोगों के साथ प्रशासनिक और विभागीय अधिकारियों की भी आवाजाही होती है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की ओर से प्रभावी कार्रवाई का अभाव साफ दिखाई देता है।
मुख्य मार्गों पर यदि खुलेआम इमारती लकड़ियां भट्टियों में जल रही हैं, तो दूरस्थ वन क्षेत्रों में अवैध कटाई की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जंगलों में सागौन, साल (सरई) और अन्य बहुमूल्य वृक्षों की कटाई की जाती है, फिर इन्हीं लकड़ियों को विभिन्न माध्यमों से होटल-ढाबों तक पहुंचाकर ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।
सबसे अधिक चिंता इस बात की है कि जिन वृक्षों को तैयार होने में वर्षों नहीं बल्कि दशकों का समय लगता है, उन्हें कुछ घंटों में भट्टियों की आग में राख बना दिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष साल (सरई) और बहुमूल्य सागौन जैसी प्रजातियों का इस प्रकार ईंधन के रूप में उपयोग केवल वन संपदा की क्षति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के दावों पर भी सीधा प्रहार है।

वन विभाग समय-समय पर अवैध कटाई और लकड़ी तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने का दावा करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आती है। सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम जल रही इमारती लकड़ियां इस बात का संकेत हैं कि निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है। नियमित निरीक्षण और प्रभावी कार्रवाई के अभाव में वन संपदा का लगातार दोहन जारी है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बहुमूल्य वृक्षों की लगातार कटाई से वन क्षेत्र, जैव विविधता, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास और जलवायु संतुलन पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। सरकार एक ओर हरियाली बढ़ाने के लिए पौधरोपण अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर इमारती लकड़ियों का खुलेआम ईंधन के रूप में उपयोग उन प्रयासों को कमजोर कर रहा है।

स्थानीय नागरिकों ने वन विभाग, वन विकास निगम और जिला प्रशासन से होटल-ढाबों में उपयोग हो रही लकड़ियों के स्रोत की गहन जांच कराने, अवैध कटाई से जुड़े नेटवर्क का खुलासा करने तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि केवल छोटी-मोटी कार्रवाई से समस्या समाप्त नहीं होगी, बल्कि जंगल से भट्टी तक लकड़ी पहुंचाने वाली पूरी श्रृंखला पर प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।

कबीरधाम की बहुमूल्य वन संपदा लगातार धुएं में उड़ रही है। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो जंगलों की हरियाली पर संकट और गहराएगा तथा वन संरक्षण के दावे केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएंगे।

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