भारत – अमेरिका व्यापार समझौता 2026 : रणनीतिक आर्थिक साझेदारी का नया अध्याय - डॉ. श्रद्धा मिश्रा
2026-02-18 11:04:38
भारत – अमेरिका व्यापार समझौता 2026 : रणनीतिक आर्थिक साझेदारी का नया अध्याय
- डॉ. श्रद्धा मिश्रा
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण विकास को दर्शाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और वित्त वर्ष 2024–25 (FY25) में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 132.2 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया।
फरवरी 2026 में भारत एवं अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता संपन्न हुआ, जिसके अंतर्गत अमेरिका ने भारत से आयात पर प्रभावी शुल्क घटाकर 18% कर दिया। इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक तनाव में उल्लेखनीय कमी आई। यह समझौता दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत की नीति समझौते करने की नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता निभाने की है। हम पूरे आत्मविश्वास के साथ देशहित में निर्णय लेते हैं !अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले भारत द्वारा रूसी तेल व्यापार के कारण लगाए गए अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क “Punitive Tariff” को समाप्त किया और 25% के रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप भारत से अमेरिका को निर्यात पर कुल प्रभावी शुल्क 18% रह गया।
7 फरवरी 2026 को दोनों देशों ने इस संबंध में एक संयुक्त बयान जारी किया। 2 फरवरी 2026 को घोषित भारत–अमेरिका व्यापार समझौता 2026 को एक रणनीतिक आर्थिक पुनर्संरचना के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य 2025 के अंत में उभरे व्यापार संघर्ष को कम करना था। इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मिली, जबकि अमेरिका को ऊर्जा एवं कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक खरीद का आश्वासन प्राप्त हुआ। समझौते के अंतर्गत अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर अधिकतम 50% तक पहुंच चुके टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया और रूसी तेल आयात से जुड़े अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क को समाप्त किया। ऊर्जा आपूर्ति में पुनर्संयोजन के तहत भारत ने रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने तथा अमेरिका (और संभावित रूप से वेनेजुएला) से आयात बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। भारत ने ऊर्जा, कृषि, कोयला एवं प्रौद्योगिकी उत्पादों की लगभग 500 अरब डॉलर की खरीद मंशा जाहिर की है, जो संभवतः कई वर्षों में पूरी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वस्त किया है कि हितों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी। कोई भी भारतीय सरकार करोड़ों किसानों की आजीविका को कमजोर करने या सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से समझौता करने का जोखिम नहीं उठा सकती।
पारस्परिक बाजार पहुँच के अंतर्गत भारत अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों पर टैरिफ एवं गैर-टैरिफ बाधाओं को चरणबद्ध तरीके से शून्य के निकट लाने की दिशा में आगे बढ़ेगा, जबकि डेयरी और मुख्य कृषि क्षेत्रों, विशेषकर खाद्यान्न फसलों को समझौते से बाहर रखकर घरेलू किसानों के हितों की सुरक्षा की गई है। SHANTI अधिनियम, 2025 के अंतर्गत अमेरिकी कंपनियों को भारत के असैनिक परमाणु ऊर्जा एवं डेटा सेंटर क्षेत्रों में अधिक अवसर दिए गए हैं। 18% टैरिफ दर भारत को वियतनाम, बांग्लादेश और पाकिस्तान (19–20%) जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति प्रदान करती है।
केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा गया है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि विकसित भारत (विकसित भारत) की दिशा में जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे देश के समग्र विकास और आत्मनिर्भरता को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। समझौते में ऐसा कोई प्रावधान शामिल नहीं किया गया जिससे भारतीय किसानों को नुकसान पहुँचे; कोई भी आनुवंशिक रूप से संशोधित (GMF) वस्तुएँ भारत में नहीं आएंगी तथा मांस, पोल्ट्री, डेयरी, सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, बाजरा, केले, स्ट्रॉबेरी, चेरी, खट्टे फल, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, इथेनॉल और तंबाकू पर अमेरिका को टैरिफ में कोई छूट नहीं दी गई है। इसके अतिरिक्त कई वस्तुओं पर भारत से अमेरिका को निर्यात शुल्क 50% से घटाकर 0% कर दिया जाएगा, जिनमें रत्न व हीरे, फार्मास्यूटिकल उत्पाद, एयरक्राफ्ट पार्ट्स, मशीनरी पार्ट्स, जेनेरिक दवाएँ, कुछ ऑटो पार्ट्स, प्लैटिनम, घड़ियाँ, एसेंशियल ऑयल, घर की सजावट का सामान जैसे झूमर और लैंप के पार्ट्स, कुछ इनऑर्गेनिक केमिकल, कुछ कागज, प्लास्टिक व लकड़ी की वस्तुएँ शामिल हैं।
कई कृषि उत्पादों पर भी निर्यात शुल्क 50% से घटकर 0% हो जाएगा, जिनमें मसाले, चाय, कॉफी, खोपरा, नारियल व नारियल तेल, वनस्पति तेल, सुपारी, ब्राजील नट्स, काजू, शाहबलूत, एवोकाडो, केले, अमरूद, आम, कीवी, पपीता, मशरूम, सब्जी उगाने की सामग्री, सब्जियों के अर्क व जड़ें, जौ जैसे अनाज तथा कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ शामिल हैं। भारत ने उन्हीं वस्तुओं पर टैरिफ कम या समाप्त किए हैं जिनकी उसे आवश्यकता है और जिनका घरेलू उत्पादन अपर्याप्त है। कुछ टैरिफ तुरंत हटाए जाएंगे, कुछ चरणबद्ध तरीके से, जबकि कुछ पर कोटा-आधारित व्यवस्था लागू होगी। इनमें सेब, DDGS, वाइन व स्पिरिट (न्यूनतम आयात मूल्य सहित), पिस्ता, अखरोट, बादाम, औद्योगिक इनपुट, कैंसर, हृदय एवं न्यूरोलॉजिकल उपचार की दवाएँ, कुछ कॉस्मेटिक्स, कार्बनिक व अकार्बनिक रसायन, कंप्यूटर से संबंधित उत्पाद और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं, तथा अमेरिका आवश्यक ICT उत्पाद उपलब्ध कराने पर सहमत हुआ है।
यह समझौता कपड़ा, चमड़ा और रत्न–आभूषण जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को राहत प्रदान करता है, रणनीतिक रूप से हिंद–प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को सुदृढ़ करता है और चीन के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में भारत–अमेरिका साझेदारी को मजबूत बनाता है। व्यापारिक अनिश्चितता कम होने से रुपये में स्थिरता तथा शेयर बाजारों (सेंसेक्स/निफ्टी) में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई है, जबकि डेटा सेंटर और परमाणु क्षेत्र में सहयोग से बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की संभावना बनी है। साथ ही यह समझौता भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाने वाली कंपनियों के लिए एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करता है। हालांकि, रूसी तेल आयात में कमी से भारत–रूस संबंधों पर प्रभाव, घरेलू राजनीतिक असहमति, शून्य-टैरिफ से MSMEs पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव, आयात व्यय में वृद्धि तथा अमेरिकी गुणवत्ता व SPS मानकों से जुड़े गैर-टैरिफ अवरोध जैसी चुनौतियाँ बनी रह सकती हैं। आगे की दिशा में इस संयुक्त बयान को औपचारिक बाध्यकारी संधि का रूप देना, LNG टर्मिनलों और बंदरगाह अवसंरचना का विस्तार, अमेरिका के साथ-साथ यू.के., ई.यू. और खाड़ी देशों के साथ FTAs को आगे बढ़ाना, MSMEs को तकनीकी उन्नयन हेतु सहायता देना तथा द्विपक्षीय निगरानी तंत्र स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा।
समग्र रूप से भारत–अमेरिका व्यापार समझौता 2026 एक संतुलित और व्यवहारिक पहल है, जिसमें ऊर्जा क्षेत्र में रियायतों के बदले भारतीय विनिर्माण और निर्यात हितों को संरक्षण मिला है, 18% टैरिफ दर सुनिश्चित कर प्रमुख निर्यात क्षेत्रों की रक्षा की गई है और जटिल वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है; इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत घरेलू कृषि हितों और वैश्विक व्यापार लक्ष्यों के बीच कितना प्रभावी संतुलन स्थापित कर पाता है।
भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर संतुलित और सकारात्मक रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है। हम सौदेबाजी की राजनीति में विश्वास नहीं करते, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हैं और सकारात्मक संवाद को महत्व देते हैं। यही कारण है कि आज भारत वैश्विक स्तर पर एक विश्वसनीय और मजबूत साझेदार के रूप में उभर रहा है।