संस्कृति

मानव जीवन का उद्देश्य और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग

 

जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास भिलाई में चल रही 11 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के ग्यारहवें  एवं अंतिम दिन बताया कि वेददृशास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि में मानव जीवन सर्वोत्तम और दुर्लभ है। 84 लाख योनियों में भ्रमण के पश्चात प्राप्त यह मानव देह ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र साधन है। प्रत्येक जीव का परम लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है, और वह आनंद केवल ईश्वर को जानने एवं उनकी भक्ति से ही संभव है। सांसारिक सुख क्षणिक और नश्वर हैं, जबकि ईश्वर का सुख शाश्वत है।
 
मनुष्य स्वभावतः ईश्वर का अंश होते हुए भी अज्ञानवश संसार में आसक्त होकर दुःख भोगता है। वेद बताते हैं कि प्रत्येक जीव आस्तिक भी है और नास्तिक भी आस्तिक इसलिए कि वह निरंतर आनंद की खोज करता है, और नास्तिक इसलिए कि व्यवहार में वह इंद्रिय-भोग को ही प्राथमिकता देता है। वास्तविक समस्या बाह्य संसार नहीं, बल्कि मन के भीतर का संसार है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ग्रसित रहता है।
 
ईश्वर को बुद्धि मात्र से नहीं जाना जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे महान तत्व भी उन्हें पूर्णतः नहीं जान सकते। ईश्वर-प्राप्ति केवल भगवद् कृपा से संभव है, और वह कृपा मन-बुद्धि की पूर्ण शरणागति से प्राप्त होती है। इसके लिए एक वास्तविक गुरु (महापुरुष) का मार्गदर्शन अनिवार्य है, जो स्वयं ईश्वर-तत्त्व का अनुभवी हो।
वेद तीन मार्ग बताते हैं कर्म, ज्ञान और भक्ति। कर्मकांड केवल स्वर्ग तक सीमित फल देता है, ज्ञान मार्ग कलियुग में अत्यंत कठिन है, जबकि भक्ति मार्ग सरल, सर्वसुलभ और श्रेष्ठ है। भक्ति का सार है मन को संसार से हटाकर निरंतर ईश्वर में लगाना। जब मन पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में आ जाता है, तभी मानव जीवन सार्थक होता है और जीव को वास्तविक आनंद की प्राप्ति होती है।
 
दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के अंतिम दिन, विश्व ध्यान दिवस पर दीदी जी के सानिध्य में एक दिवसीय साधना शिविर के आयोजन में साधको ने रुपध्यान अभ्यास कर साधना का लाभ लिया। प्रवचन के पश्चात् श्री गुरुदेव चरण पादुका पूजन के एवं महाआरती का आयोजन हुआ।

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