छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

सागौन तस्करी का काला खेल, वर्षों की अनदेखी से उजड़ते रहे जंगल, जिम्मेदार मौन

 सागौन तस्करी का काला खेल, वर्षों की अनदेखी से उजड़ते रहे जंगल, जिम्मेदार मौन


कवर्धा/पंडरिया। पंडरिया वन उप मंडल के पूर्व परिक्षेत्र में सागौन की अवैध कटाई और तस्करी के मामले में वन विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधी रात की छापेमार कार्रवाई में लाखों रुपये की सागौन लकड़ी, दो पिकअप वाहन, आरा, तलवार और इमारती लकड़ी जब्त होना इस बात का संकेत है कि यह कोई एक-दो दिन का कारोबार नहीं, बल्कि वर्षों से संगठित तरीके से संचालित अवैध नेटवर्क है। जंगलों से इतने बड़े पैमाने पर सागौन के पेड़ों की कटाई और लकड़ी का भंडारण इस ओर इशारा करता है कि वन संपदा का दोहन लंबे समय से लगातार होता रहा और इस दौरान जंगलों को भारी नुकसान पहुंचा।

वन विभाग की कार्रवाई में जंगल के भीतर बड़ी संख्या में सागौन के ठूंठ मिलने की जानकारी भी सामने आई है। इससे स्पष्ट होता है कि इमारती पेड़ों की कटाई लंबे समय से जारी थी। सवाल यह है कि नियमित गश्त, बीट गार्ड, वनरक्षक, डिप्टी रेंजर और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई आखिर कैसे होती रही। यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी होती तो जंगलों की यह स्थिति शायद नहीं बनती।

स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से यह चर्चा रही है कि रात के अंधेरे में लकड़ी से भरे वाहन क्षेत्र से निकलते रहे हैं। इतने बड़े पैमाने पर अवैध कटाई और परिवहन केवल तस्करों के भरोसे संभव नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि अब पूरे घटनाक्रम में विभागीय लापरवाही, अनदेखी अथवा संरक्षण की आशंकाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। इन आशंकाओं की पुष्टि केवल निष्पक्ष और व्यापक जांच से ही हो सकती है।

इस पूरे मामले में एक आरोपी का थाना परिसर से पुलिस को चकमा देकर फरार हो जाना भी पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े कर गया है। इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद पुलिस थाना परिसर से आरोपी का भाग निकलना सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली की गंभीर चूक की ओर संकेत करता है। इससे यह चर्चा भी तेज हो गई है कि आखिर आरोपी थाना परिसर से कैसे निकल गया। अब केवल फरार आरोपी की गिरफ्तारी ही नहीं, बल्कि उसके फरार होने की परिस्थितियों की भी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है। यदि इस मामले में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।

पर्यावरण की दृष्टि से भी यह मामला बेहद गंभीर है। सागौन जैसे बहुमूल्य इमारती वृक्ष तैयार होने में कई दशक लगते हैं, जबकि इन्हें काटने में कुछ घंटे ही पर्याप्त होते हैं। यदि वर्षों तक इसी तरह कटाई होती रही तो इसका सीधा असर वन संपदा, जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर पड़ा होगा। कई क्षेत्रों में जंगल विरल होने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन उन पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी।

अब जरूरत केवल लकड़ी जब्त करने या कुछ आरोपियों पर प्रकरण दर्ज करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कर यह सामने लाना आवश्यक है कि अवैध कटाई कब से चल रही थी, किन क्षेत्रों से लकड़ी निकाली गई, किन लोगों ने इसका लाभ उठाया और इस पूरे कारोबार के दौरान किस स्तर पर लापरवाही या संरक्षण मिला। यदि जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रही तो जंगलों को नुकसान पहुंचाने वाले वास्तविक जिम्मेदार कानून के दायरे से बाहर रह जाएंगे।

वन संपदा पूरे समाज की धरोहर है। इसलिए इस मामले में केवल तस्करों के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही, अनदेखी या संरक्षण की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जिले के जंगलों को बचाने और जनता का विश्वास कायम रखने के लिए आवश्यक है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यापक जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों को बेनकाब किया जाए।

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