मनरेगा की ‘डबरी’ से संवरी कमलोचन की जिंदगी
कुम्हली में खिली खुशहाली और आत्मनिर्भरता की नई धूप
जगदलपुर, 06 अक्टूबर 2026
बस्तर जिले के जगदलपुर विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत कुम्हली के किसान श्री कमलोचन नाग आत्मज श्री पुरनाथ के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उम्मीद की एक नई किरण बनकर सामने आई है। करीब 5 एकड़ कृषि भूमि के स्वामी कमलोचन पहले केवल वर्षा ऋतु में ही किसी तरह एक फसल ले पाते थे, जबकि साल के शेष समय सिंचाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण उनकी अधिकांश भूमि बंजर और वीरान पड़ी रहती थी। सीमित उत्पादन और नाममात्र की आय के चलते वे अपने परिवार का भरण-पोषण बेहद कठिनाई से कर पा रहे थे।
उनकी इस आर्थिक तंगी और बेबसी के दौर में बदलाव तब आया, जब ग्राम पंचायत में उनकी भेंट मनरेगा के तकनीकी सहायक से हुई। तकनीकी सहायक ने उन्हें मनरेगा योजना के अंतर्गत निजी खेत में डबरी निर्माण की प्रक्रिया, वर्षा जल संचयन की उपयोगिता, सिंचाई के लाभ और अतिरिक्त आय के लिए मछलीपालन की संभावनाओं से विस्तारपूर्वक अवगत कराया। समाधान की यह राह देखते ही कमलोचन ने परिवार से विमर्श कर डबरी निर्माण हेतु ग्राम पंचायत में आवेदन प्रस्तुत कर दिया।
जिला पंचायत से प्रशासकीय स्वीकृति मिलते ही ग्राम पंचायत कुम्हली ने बिना किसी विलंब के निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया। वित्तीय वर्ष 2023-24 के तहत स्वीकृत एक लाख 98 हजार रुपए तथा एक लाख 66 हजार रुपए की व्यय राशि से हुए इस कार्य में कमलोचन के स्वजनों सहित गाँव के अन्य मनरेगा श्रमिकों को भी सीधा रोजगार प्राप्त हुआ। महज 40 दिनों की सामूहिक मेहनत से कमलोचन के खेत में 30 मीटर लंबी, 30 मीटर चैड़ी और 3 मीटर गहरी डबरी का ढांचा बनकर तैयार हो गया।
आषाढ़ मास की झमाझम फुहारों ने जब डबरी को लबालब पानी से भर दिया, तब कमलोचन ने उसमें मछली के बीज डाले और आसपास की जमीन में नमी बनी रहने का सुखद परिणाम धान की भरपूर पैदावार के रूप में सामने आया। धान की कटाई के पश्चात उन्होंने इसी डबरी के जल से अपनी बाड़ी की सिंचाई की और डबरी की मेड़ों पर केला, मटर, बैंगन, धनिया, मिर्ची तथा नीलगिरी के पौधे रोपे। इन सब्जियों से न केवल उनके घर का दैनिक खर्च समाप्त हुआ, बल्कि ग्रामीणों को ताजी सब्जियाँ बेचकर उन्होंने अतिरिक्त नकदी भी जुटाई। इसके साथ ही डबरी की मछलियाँ बड़ी होने पर परिवार के पौष्टिक आहार का माध्यम बनीं और बाजार में उनकी बिक्री से घर की आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा हुआ।
अपनी इस नई जिंदगी पर संतोष व्यक्त करते हुए कमलोचन साझा करते हैं कि पानी के अभाव में जो हाथ पहले बंधे हुए थे, डबरी मिलने के बाद उन्हें तरक्की और स्वावलंबन का एक नया रास्ता मिल गया है। यह डबरी आज केवल जल संरक्षण का साधन मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह दृढ़ इच्छाशक्ति और कल्याणकारी सरकारी नीतियों के समन्वय से छोटे किसानों के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलाव की एक जीवंत मिसाल बन चुकी है।