छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

नियमों को ताक पर रखकर एक शिक्षक को तीन-तीन प्रभार!

नियमों को ताक पर रखकर एक शिक्षक को तीन-तीन प्रभार!

मूल शाला से 85 किलोमीटर दूर अधीक्षक और प्राचार्य की जिम्मेदारी, विभागीय आदेशों के पालन पर उठे सवाल

कवर्धा  - : जिले के शिक्षा विभाग और आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विकासखंड पंडरिया के पोलमी में एक शिक्षक को तीन-तीन महत्वपूर्ण पदों का प्रभार सौंपे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि शासन के स्पष्ट निर्देशों और विभागीय आदेशों के बावजूद संबंधित शिक्षक को अब तक प्रभार से मुक्त नहीं किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर विभागीय नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी किसकी है और आदेशों की अनदेखी पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिक्षक खेमराज जांगड़े की मूल पदस्थापना कवर्धा विकासखंड अंतर्गत पूर्व माध्यमिक शाला झिरौनी में बताई गई है। इसके बावजूद वे विकासखंड पंडरिया के पोलमी में आदिम जाति तथा जनजाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित विशेष पिछड़ी जनजाति आवासीय विद्यालय के प्रभारी अधीक्षक एवं प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, उन्हें पोलमी स्थित आदिवासी बालक छात्रावास के प्रभारी अधीक्षक का प्रभार भी दिया गया है।

इस प्रकार एक ही शिक्षक के पास तीन महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी होने से विभागीय व्यवस्था, कार्यविभाजन और नियमों के पालन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि संबंधित शिक्षक की मूल पदस्थापना और प्रभार वाले संस्थानों के बीच लगभग 85 किलोमीटर की दूरी बताई जा रही है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि उनकी मूल शाला में नियमित उपस्थिति और अध्यापन कार्य किस प्रकार सुनिश्चित किया जा रहा है।

तीन पदों की जिम्मेदारी, मूल शाला में अध्यापन का क्या होगा?

शिक्षा व्यवस्था का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि किसी शिक्षक को उसकी मूल शाला से दूर अन्य संस्थानों में विभिन्न प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है, तो उसकी मूल शाला में अध्यापन कार्य प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

एक ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता और नियमित अध्यापन को लेकर लगातार सवाल उठते हैं, वहीं दूसरी ओर एक ही शिक्षक को तीन-तीन पदों का प्रभार दिए जाने की स्थिति सामने आना विभागीय कार्यप्रणाली की समीक्षा की जरूरत दर्शाता है।

हालांकि, संबंधित शिक्षक को ये प्रभार किन परिस्थितियों में और किस आदेश के तहत सौंपे गए, इसकी आधिकारिक पुष्टि तथा विभाग का पक्ष सामने आना अभी आवश्यक है। लेकिन यदि शासन के निर्देशों के विपरीत व्यवस्था जारी है, तो इसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
वीएसके एप से उपस्थिति के नियमों पर भी सवाल
कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी, कबीरधाम द्वारा जारी आदेश क्रमांक /स्था.2/2026/7077 के अनुसार, विद्या समीक्षा केंद्र (वीएसके) एप के माध्यम से शिक्षकों की वास्तविक समय में ऑनलाइन उपस्थिति की निगरानी की जा रही है। आदेश के अनुसार, शिक्षकों की मूल पदस्थ शाला से ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने और निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। शत-प्रतिशत ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने की स्थिति में वेतन आहरण प्रतिबंधित किए जाने का भी उल्लेख बताया गया है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि झिरौनी स्थित मूल शाला में पदस्थ शिक्षक पोलमी के विभिन्न संस्थानों में प्रभार संभालते हुए अपनी मूल शाला की उपस्थिति संबंधी शर्तों का पालन किस प्रकार कर रहे हैं? क्या उनकी ऑनलाइन उपस्थिति और वास्तविक कार्यस्थल का नियमानुसार सत्यापन किया गया है? क्या उनके वेतन आहरण से पहले संबंधित अभिलेखों की जांच की गई है?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय अधिकारियों को दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट करना चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
आयुक्त के निर्देशों के बाद भी प्रभार जारी रहने पर सवाल
कार्यालय आयुक्त, आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास, नवा रायपुर द्वारा जारी पत्र क्रमांक /61862/2026-HOSTEL ASHRAM ST&SC HOD में शिक्षक संवर्ग के ऐसे अधीक्षकों को तत्काल कार्यमुक्त करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है, जो अपनी मूल पदस्थ शाला से दूर संचालित आवासीय संस्थाओं में अधीक्षक का प्रभार संभाल रहे हैं।
निर्देशों के अनुसार, ऐसे शिक्षकों को उनकी मूल शाला में अध्यापन कार्य के लिए उपलब्ध कराने तथा छात्रावासों और आश्रमों के सुचारू संचालन हेतु उसी संस्था अथवा एक-दो किलोमीटर के दायरे में स्थित नजदीकी शालाओं के योग्य एवं इच्छुक शिक्षकों को प्रभार सौंपने का प्रस्ताव तैयार किया जाना है।
इसी क्रम में जिला शिक्षा अधिकारी, कबीरधाम द्वारा 7 सितंबर 2026 को तीन दिनों के भीतर ऐसे शिक्षकों की सूची मांगे जाने की जानकारी भी सामने आई है, ताकि उन्हें मूल शाला के लिए कार्यमुक्त कर नजदीकी विद्यालयों के इच्छुक शिक्षकों को प्रभार सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके।
अब सवाल यह है कि जब दूरस्थ आवासीय संस्थानों में प्रभार संभाल रहे शिक्षकों को कार्यमुक्त करने के लिए निर्देश जारी किए गए, तो संबंधित मामले में उन निर्देशों का पालन हुआ या नहीं? यदि आदेश लागू हैं, तो तीन-तीन प्रभारों की व्यवस्था अब तक जारी रहने के पीछे क्या कारण हैं?
चहेतों को उपकृत करने के आरोप, पारदर्शिता की मांग
इस मामले ने विभागीय कार्यविभाजन और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि नियमों के अनुरूप व्यवस्था करने के बजाय कुछ शिक्षकों को महत्वपूर्ण पदों का अतिरिक्त प्रभार देकर उपकृत किया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही हो सकेगी।
मामले में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि तीनों प्रभार सौंपने के लिए सक्षम अधिकारी ने कौन-सा आदेश जारी किया, संबंधित शिक्षक की मूल शाला में उपस्थिति की क्या स्थिति है और शासन के निर्देशों के अनुरूप अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
प्रशासन से उठ रही जवाबदेही तय करने की मांग
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन, जिला शिक्षा अधिकारी और आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। संबंधित आदेशों, पदस्थापना अभिलेखों, ऑनलाइन उपस्थिति और वेतन आहरण की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए।
यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित व्यवस्था के लिए उत्तरदायित्व तय करते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही, शिक्षक को मूल शाला में नियमित अध्यापन के लिए उपलब्ध कराने और छात्रावासों का संचालन नियमानुसार सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए।
अब बड़ा सवाल यही है कि शासन के आदेशों का पालन केवल कागजों तक सीमित रहेगा या कबीरधाम प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच कर जवाबदेही भी तय करेगा?

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