रेगाखार-झलमला में रेत परिवहन पर सवाल, अवैध निकासी की शिकायतों पर कार्रवाई का इंतजार
कबीरधाम |
2026-10-26 18:53:53
नदी-नालों से रेत निकालने की शिकायतें, दर्जनों ट्रैक्टरों से परिवहन का आरोप; प्रधानमंत्री आवास हितग्राहियों को 4500 से 5000 रुपये प्रति ट्रैक्टर में रेत बिक्री की चर्चा
कवर्धा। वनांचल में रेत के कथित अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर सवाल उठने लगे हैं। रेगाखार और झलमला के आसपास नदी-नालों से रेत निकालकर दर्जनों ट्रैक्टरों के माध्यम से परिवहन किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि क्षेत्र में जहां भी नदी या नाला है, वहीं से रेत निकालकर निर्माण कार्यों के लिए पहुंचाई जा रही है। इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आने से वन विभाग, खनिज विभाग और राजस्व विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
सबसे गंभीर पहलू प्रधानमंत्री आवास योजना के हितग्राहियों को रेत की आपूर्ति से जुड़ा है। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि हितग्राहियों को 4500 से 5000 रुपये प्रति ट्रैक्टर की दर से रेत बेची जा रही है। हालांकि, इस दर, रेत के स्रोत और कथित अवैध परिवहन की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में संबंधित विभागों द्वारा मौके पर जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।
नदी-नालों से रेत निकासी की शिकायतें
रेगाखार और झलमला क्षेत्र में रेत परिवहन को लेकर उठ रही शिकायतें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और खनिज नियमों के पालन से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय हैं। यदि बिना वैध अनुमति रेत का उत्खनन और परिवहन किया जा रहा है, तो यह नियमों का उल्लंघन हो सकता है। ऐसे मामलों में केवल ट्रैक्टरों की आवाजाही पर नजर रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रेत निकासी के वास्तविक स्थल, परिवहन दस्तावेजों और आपूर्ति के स्रोत की भी जांच आवश्यक है।
खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 तथा छत्तीसगढ़ में लागू खनिज नियमों के तहत अवैध उत्खनन और परिवहन के मामलों में प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, संबंधित नदी-नालों और भूमि की स्थिति के आधार पर पर्यावरणीय शर्तों तथा अन्य लागू नियमों का पालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री आवास हितग्राहियों पर आर्थिक बोझ का सवाल
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को पक्का मकान उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि हितग्राहियों को 4500 से 5000 रुपये प्रति ट्रैक्टर की दर से रेत खरीदनी पड़ रही है, तो रेत की उपलब्धता, कीमत और आपूर्ति के स्रोत की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि रेत वैध स्रोत से लाई जा रही है या नदी-नालों से कथित अवैध निकासी के जरिए निर्माण स्थलों तक पहुंचाई जा रही है।
यदि अवैध उत्खनन की पुष्टि होती है, तो इससे शासन के राजस्व को नुकसान पहुंचने और प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका भी है। हालांकि, किसी विशेष दर को अनुचित या अवैध ठहराने के लिए स्थानीय बाजार दरों, परिवहन लागत और संबंधित नियमों के आधार पर तथ्यों की पुष्टि जरूरी है।
तीन विभागों की भूमिका पर सवाल
इस मामले में खनिज विभाग की जिम्मेदारी अवैध उत्खनन और परिवहन की शिकायतों की जांच करना है। वन क्षेत्र या वन भूमि से संबंधित मामलों में वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जबकि राजस्व विभाग को अपने अधिकार क्षेत्र में भूमि और संबंधित अनुमति की स्थिति देखनी होगी।
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि दबाव के कारण प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हालांकि, किसी अधिकारी की मिलीभगत या दबाव में काम करने के आरोपों की पुष्टि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही की जा सकती है। संबंधित विभागों को स्पष्ट करना चाहिए कि क्षेत्र में अब तक कितने निरीक्षण किए गए, कितने वाहन जांच के दायरे में आए और शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई।
जांच और कार्रवाई से ही स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति
रेगाखार और झलमला क्षेत्र में रेत निकासी के कथित स्थलों का निरीक्षण, ट्रैक्टरों के दस्तावेजों की जांच और रेत आपूर्ति के स्रोत का सत्यापन जरूरी है। शिकायतें सही पाई जाती हैं तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सवाल यह है कि नदी-नालों से रेत निकासी की शिकायतों पर जिम्मेदार विभाग कब ठोस कदम उठाएंगे। वनांचल के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और प्रधानमंत्री आवास हितग्राहियों को निर्माण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। मौके पर जांच और कार्रवाई के तथ्य सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि क्षेत्र में रेत का परिवहन नियमों के अनुरूप हो रहा है या कहीं अवैध उत्खनन का मामला है।