बिलासपुर। इतिहास के पन्नों में बावली कुआं की कई दंतकथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं कहानियों के बीच एक रहस्यमयी स्थल, बावली कुआं, गोलबाजार और गांधी चौक के बीच स्थित है। यह न केवल शहर की पहचान है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक धरोहर की अद्भुत मिसाल भी है। हिंदू यहाँ गणेश और दुर्गा प्रतिमा स्थापित कर पूजा करते हैं, वहीं मोहर्रम में ताजिया भी बैठाया जाता है। हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक यह बावली कुआं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी वास्तविकता और ऐतिहासिक महत्व भी काफी है।
भोसले राजाओं ने बनवाया था कुआं
1860 में रघुजी भोसले के आदेश पर पुरुषोत्तम शेष ने इस बावली का निर्माण करवाया था। यह नागपुर शैली की बेहतरीन कलाकारी का उदाहरण है। उस समय बिलासपुर रतनपुर रियासत का हिस्सा था। शेष परिवार ने न केवल इस ऐतिहासिक कुएं का निर्माण कराया, बल्कि इसका संरक्षण भी किया। कहा जाता है कि उस दौर में रानियां यहां स्नान करती थीं और अंग्रेजी सैनिक इसी कुएं से अपनी प्यास बुझाते थे।
सुरंगों की गूंज और राजाओं की कहानियां
श्किवदंतियों के अनुसार, बावली कुएं के भीतर सुरंगें हैं जो रतनपुर तक जाती हैं। यह कहा जाता है कि इन सुरंगों का उपयोग राज परिवार की महिलाएं स्नान करने के लिए करती थीं। डॉ. गोपाल शेष इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते, लेकिन इस रहस्य ने इस स्थान को और भी दिलचस्प बना दिया है।
निगम की सील-मोहर में है बावली का चिन्ह
नगर निगम बिलासपुर की सील में बावली को स्थान दिया गया है। इसकी वजह यह है कि बावली कुआं से बिलासपुर का इतिहास जुड़ा हुआ है। जर्जर स्थिति में पहुंचने के बाद नगर निगम ने नागपुर से कारीगर बुलाकर इसे वर्तमान स्वरूप में ठीक कराया।
दादा-दादी से सुनी है इस कुएं की कहानी
बावली कुआं के पास रहने वाले नरेंद्र बोलर बताते हैं कि जब वे छोटे थे, तब उन्होंने अपने दादा-दादी से इस कुएं की कहानी सुनी थी। इस कुएं की सुरंगें रतनपुर तक जाती थीं और रतनपुर राजवंश के लोग इसी पानी का उपयोग करते थे। रानियां पालकी में यहां स्नान करने के लिए आया करती थीं।