अखिलेश ने परिमल को प्रत्याशी बनाकर सबको चौंका दिया
राजनीति में कई राजनीतिक दल ऐसे होते हैं जो वह कहते हैं, बरसों तक कहते हैं और अचानक वह उसके उलट फैसला करते हैं तो सबको हैरत होती है कि ऐसा कैसे हो गया।राजनीति में विचारधारा की राजनीति करने वाले राजनीतिक की पहचान ही उनकी विचारधारा होती है।जब वह विचारधारा वाली राजनीति को अचानक बदल देते हैं तो सब हैरत में आकर कहते हैं कि इस राजनीतिक दल के नेता से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी।यूपी की समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव हो या उनके सुपुत्र अखिलेश यादव हो।वह हमेशा गर्व से खुद को समाजवादी कहते रहे हैं।समाजवादी मतलब होता है कि पूंजीवाद के घोर विरोधी। इसलिए समाजवादी मूलतः पूंजीवाद के प्रखर विरोधी माने जाते रहे हैं।लेकिन वर्तमान में समाजवादी पार्टी के नाम से लग सकता है कि इसके नेता प्रखर पूंजीवाद विरोधी होंगे।उनकी पार्टी में पूंजीपतियों के लिए कोई जगह नहीं होगी। लेकिन वक्त के समाजवादी बदले हैं और उनके विचार भी बदले हैं।
वर्तमान में राजनीति करनी है तो उसके लिए बहुत पैसा लगता है और पैसा तो पूंजीपति के पास होता है।इसलिए किसी राजनीतिक दल का नाम समाजवादी पार्टी हो तो वह लोगों को बताने के लिए होता है कि हम वैचारिक तौर पर समाजवादी विचारधारा वाले हैं यानी हम गरीबों,वंचितों,पीडि़तों के लिए लडने वाले है, उनके लिए राजनीति करने वाले हैं।हमारी राजनीति अमीरों के लिए नहीं है।मुलायम सिंह यादव के समय जो समाजवादी पार्टी थी,वह अखिलेश यादव के समय से वैचारिक रूप से जितनी बदली है,व्यवहारिक से उससे ज्यादा बदल गई है।समाजवादी पार्टी के नेता,कार्यकर्ता पीडीए के हैं यानी पिछड़े वर्ग,दलित व अल्पसंख्यक है। यह अखिलेश यादव के समय की समाजवादी पार्टी है यानी सपा जो है वह राजनीतिक तौर पर, वैचारिक तौर पर पिछड़ों की है,दलितों की है और अल्पसंख्यकों की है। यानी पार्टी में नेता इसी वर्ग होंगे, पदाधिकारी इसी वर्ग के होंगे,चुनाव में टिकट इन्हीं वर्ग के लोगों को टिकट दी जाएगी लेकिन जब राज्यसभा में किसी को भेजना होगा तो अखिलेश यादव भेजने में हिचकते नहीं है।
वैचारिक राजनीति की जगह व्यवहारिक राजनीति सभी राजनीतिक दल करते हैं. यही राजनीति अखिलेश यादव ने की है धनराज परिमल नाथवानी को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाकर।सपा के आलोचक इस बात के लिए अखिलेश यादव की घोर आलोचना कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी का राजसभा प्रत्याशी तो पीडीए में से होना चाहिए, फिर अखिलेश यादव ने एक पूंजीपति वह भी अंबानी परिवार के करीबी को कैसे राज्यसभा प्रत्याशी बना दिया।यह तो पार्टी के पीडीए लोगों के साथ धोखा है. यह तो पार्टी की विचारधारा के खिलाफ है, नाम के खिलाफ है।फिर भी अखिलेश यादव ने ऐसा किया है तो उसकी वजह यह है कि वक्त के साथ हर विचारधारा में मिलावट होती है, जिसे वैचारिक राजनीति के जगह व्यवहारिक राजनीति कहा जाता है और कहा जाता है कि ऐसा करना हर राजनीतिक दल की मजबूरी है।
चुनाव लड़ने व संगठन को चलाने के लिए बहुत पैसा लगता है इसलिए समाजवादी नाम वाले राजनीतिक दलो को भी पूंजीपतियों की जरूरत रहती है।यही वजह है कि ज्यादातर राजनीतिक दल अपने दल में भले पूंजीपतियों को कोई पद न दें लेकिन जब राज्यसभा की बात आती है और कोई पैसा वाला उस पद पर जाना चाहता है तो उसे वह पद दे दिया जाता है. पद दिया जाता है इस शर्त पर कि वह पार्टी को आर्थिक तौर पर मदद करेगा। यानी पद लो और पैसा दो। पार्टी को आर्थिक तौर पर मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा का एक टिकट धनराज परिमल नथवानी को दे दिया।यह न तो हैरत की बात है, न ही आलोचना की बात है।अब समाजवादी होने के मतलब यह नहीं रह गया है कि कोई धन के खिलाफ है, पूंजीपतियों के खिलाफ है।अब समाजवादी मतलब हो गया है कि पैसा भी जरूरी है, पूंजीपति का सहयोग भी जरूरी है।
यही वजह है कि मुलायम सिंह ने समाजवादी होते हुए भी पैसा भी बनाया,पूंजीपतियों का सहयोग भी लिया, वही अखिलेश यादव भी कर रहे हैं क्योंकि चुनाव लड़ने व पार्टी संगठन को चलाने के लिए पैसा आज और जरूरी हो गया है।विश्लेषक तो मानते हैं कि अपने समय में जो मुलायम सिंह यादव ने नहीं किया था वह भी अखिलेश यादव कर रहे हैं,उसे अब नियो समाजवाद कहा जाता है.अखिलेश के नियो समाजवाद में किसी से कोई परहेज नहीं है.जो भी उनकी चुनावी जीत के लिए जरूरी है,अखिलेश उसे अपनाने में झिझकते नहीं है।उसके लिए आलोचना होगी तो वह उस आलोचना की परवाह नहीं करते।राहुल गांधी व अखिलेश यादव की तुलना की जाए तो वह राहुल गांधी से कई मामलों में ज्यादा लचीले हैं अगर उनको चुनाव जीतना है। राहुल गांधी के लिए अडानी-अंबानी के निकटस्थ लोगों से बात करना संभव नहीं है तो अखिलेश के लिए यह कोई मुशि्कल काम नहीं है, वह अंबानी बेटे की शादी में जा सकते हैं, वह अंबानी के करीबी के बेटे को राज्यसभा भेज सकते हैं।
अखिलेश यादव को चुनाव जीतने के लिए साफ्ट हिंदुत्व की जरूरत है तो वह मंदिर बनवा सकते हैं,शंकराचार्य से मिल सकते हैं,वह हनुमान चालीसा का सहारा ले सकते हैं,ज्योतिष मेें आस्था प्रकट कर सकते हैं,वह विकास,एआई,लैपटाप की राजनीति को धर्म,अऩष्ठान से जोड़ सकते हैं.वह खुद को सनातनी बताने के लिए सपा मुख्यालय के बाहर सनातन ही समाजवादी का बोर्ड लगा सकते है।बीजेपी ने अखिलेश यादव की इस नई रणनीति को नया नाटक कहा है। योगी आदित्यनाथ ने तो तंज करते कहा है कि अब अखिलेश एक दिन भगवा पहने हुए भी दिख सकते हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश को चुनाव जीतने के लिए जो कुछ करना पड़े वह उसके लिए प्रयास करते हैं और प्रयोग भी करते है।यही वजह है कि वह यूपी की राजनीति में आज भी दूसरे नंबर पर हैं और बने रहना चाहते हैं।वह जो कुछ भी करते हैं दूसरे नंबर पर बने रहने के लिए करते हैं क्योंकि दूसरे नंबर पर रहेंगे तो एक नंबर बन सकते हैं।