ऐमजॉन के सीईओ जेफ बेजोस के लेख से मीडिया की जिम्मेदारी पर क्यों छिड़ी बहस?
वॉशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस ने मीडिया संस्थानों की तटस्थता पर एक लेख में लिखा कि मीडिया संस्थानों को राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करना चाहिए। हमारा संस्थान भी इस बात से सहमत है और हमेशा से ही राजनीतिक मामलों में तटस्थता की नीति का पालन करता आया है। लेकिन कई पत्रकार और विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या मीडिया संस्थानों को वाकई में तटस्थ रहना चाहिए? क्या ऐसा करके वे अपनी राय व्यक्त करने और समाज को दिशा देने के अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हट रहे हैं? हमारी संपादकीय टीम ने इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की है और भारतीय दर्शन के सिद्धांतों के आधार पर अपनी बात रखी है। आइए समझते हैं कि मीडिया संस्थानों की तटस्थता का असली मतलब क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है।
जेफ बेजोस ने अपने लेख में लिखा है कि वॉशिंगटन पोस्ट किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेगा। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह के समर्थन से 'पक्षपात' और 'स्वतंत्रता की कमी' का आभास होता है। यह बात मीडिया संस्थान के लिए नुकसानदेह हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब 'बिना शोध के पॉडकास्ट' और 'सोशल मीडिया पर तंज' मीडिया संस्थानों के लिए खतरा बन गए हैं।
कई लोग, जिनमें वॉशिंगटन पोस्ट के वर्तमान और पूर्व पत्रकार भी शामिल हैं, बेजोस की इस दलील से असहमत हैं। कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि बेजोस ने कमला हैरिस के समर्थन की योजना से इसलिए कदम खींच लिया क्योंकि उन्हें डर है कि अगर ट्रंप जीत गए तो इसका खामियाजा मीडिया संस्थान को भुगतना पड़ेगा। हालांकि, बेजोस ने अपने लेख में इस बात का खंडन किया है। यह सवाल कि किसकी बात पर यकीन किया जाए, कुछ पत्रकारों के लिए दिलचस्प हो सकता है। लेकिन सभी पत्रकारों और मीडिया संस्थान के मालिकों के लिए महत्वपूर्ण बहस का जो मुद्दा है, वह यह कि क्या एक मीडिया संस्थान को तटस्थ रहना चाहिए।
हमने अपने संपादकीय स्तंभों (एडिटोरियल कॉलम्स) के माध्यम से कभी भी किसी राजनेता या राजनीतिक दल का समर्थन नहीं किया है। हमारा मानना है कि प्रतिस्पर्धी उम्मीदवारों/दलों में से किसी एक पर अपनी मुहर लगाना मीडिया संस्थान का काम नहीं है। हमारा मानना है कि मीडिया संस्थान का काम है निरीक्षण करना, समझने की कोशिश करना और विश्लेषण करना, और यह सब करते हुए एक अकादमिक दूरी बनाए रखना।
बेजोस ने लिखा है कि मीडिया संस्थानों का समर्थन मायने नहीं रखता क्योंकि वे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित नहीं करते हैं। हो सकता है कि वह सही कह रहे हों। लेकिन मीडिया संस्थान को तटस्थ रखने का यह सही कारण नहीं है। सही कारण यह है कि तटस्थता ही एकमात्र तरीका है जिससे एक मीडिया संस्थान हमेशा खुले दिमाग से काम कर सकता है। जो लोग हमारी बात से असहमत हैं, वे दो सवाल पूछ सकते हैं।
पहला, जैसा कि बेजोस के लेख के एक आलोचक ने कहा, 'अगर एक मीडिया संस्थान को तटस्थ रहना है, तो फिर संपादकीय क्यों लिखे जाएं? लेकिन समर्थन और संपादकीय में अंतर होता है। वे बहुत अलग हैं। समर्थन एक राजनेता/पार्टी के लिए होता है जो शासन करने का अधिकार चाहता है जबकि संपादकीय सरकार या विपक्ष में बैठे लोगों के विशिष्ट कार्यों/बयानों के पक्ष या विपक्ष में होता है। संपादकीय एक दिन ए के पक्ष में और बी के विरुद्ध हो सकता है, और दूसरे दिन बी के पक्ष में और ए के विरुद्ध - यह मुद्दे पर निर्भर करता है।' फुटबॉल में अच्छे कोच हमेशा कहते हैं, 'गेंद से खेलो, आदमी से नहीं।' संपादकीय गेंद से खेलते हैं, समर्थन आदमी से खेलते हैं।
दूसरा सवाल जो अक्सर समर्थन के पक्षधर लोग पूछते हैं, वह यह है कि अगर कोई मीडिया संस्थान किसी खास राजनेता/पार्टी का समर्थन करने से इनकार करके अपने 'मूल्यों' की रक्षा कैसे करता है? लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मीडिया संस्थान को चुनावी उम्मीदवार के माध्यम से अपने मूल्यों को दर्शाने की जरूरत है? ऐसा करने का मतलब है कि उम्मीदवार को उसके फेस वैल्यू पर ही स्वीकार कर लिया जाए। लेकिन एक मीडिया संस्थान को ठीक यही नहीं करना चाहिए। दूरी बनाए रखना, पूरी तरह से तटस्थ रहना, निष्पक्षता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
हमारा तटस्थता का सिद्धांत भारतीय दार्शनिक विचारों की एक लंबी परंपरा में निहित है- सभी विचारों और दृष्टिकोणों का संज्ञान लिया जाए, लेकिन अपनी पहचान को उनमें से किसी एक से न जोड़ा जाए। किसी के द्वारा प्रचारित विचारधारा को पकड़े रखना, उसका समर्थन करना, बौद्धिक बोझ के समान है। भारतीय दर्शन में यही बात लीडर्स के मामले में और भी ज्यादा लागू होती है। किसी नायक या रोल मॉडल को चुनना और उससे चिपके रहना अनिवार्य रूप से बौद्धिक आत्महानि का कार्य है। यह आपके दिमाग को बंद कर देता है।