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'दहेज प्रताड़ना में पति के दूर के रिश्तेदारों को बेवजह न लपेटे', जानिए सुप्रीम कोर्ट ने किस केस में की ये टिप्पणी

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को इस बात को लेकर सचेत किया है कि दहेज प्रताड़ना के आरोपों के मामले को गहन तरीके से परीक्षण किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि पति के दूर के रिश्तेदारों को उसमें बिना कारण न लपेटा जाए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सीटी रविकुमार ने पति के कजन और उनकी पत्नी (कजन ब्रदर और उनकी पत्नी) के खिलाफ चल रहे क्रिमिनल केस को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी है। इस मामले में महिला के पिता ने दहेज प्रताड़ना की शिकायत की थी और महिला के ससुरालियों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना की धारा-498ए के तहत केस दर्ज किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में याचिकार्ताओं ने अर्जी दाखिल कर पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज केस खारिज करने से मना कर दिया था। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ टिप्पणी की और कहा कि हाई कोर्ट के सामने जब ऐसे मामले आए, जिसमें पति के दूर के रिश्तेदार आरोपी बनाए गए हों तो से ज्यादा सचेत रहकर मामले को एग्जामिन करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के संदर्भ में प्रीति गुप्ता बनाम राज्य झारखंड मामले में शीर्ष अदालत के फैसले में की गई टिप्पणी का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि आपराधिक मुकदमे सभी संबंधितों के लिए भारी कष्ट का कारण बनते हैं। यहां तक कि मुकदमे में अंतिम रूप से आरोपी का बरी होना भी अपमान के गहरे घावों को मिटा नहीं सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह टिप्पणी दरअसल यह चेतावनी थी कि पति के परिवार के किसी करीबी रिश्तेदार के अलावा अन्य किसी व्यक्ति को आरोपी बनाए जाने की स्थिति में यह देखना अदालत की जिम्मेदारी है कि क्या आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए हैं या फिर बिना कारण ज्यादा लोगों को इसमें आरोपी के तौर पर शामिल तो नहीं किया गया?

'सामान्य समझ के साथ रिलेटिव शब्द को परिभाषित करें'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रिलेटिव यानी रिश्तेदार शब्द को कानून में अलग से परिभाषित नहीं किया गया है और इसे सामान्य समझ के अनुसार परिभाषित किया जाना चाहिए। आमतौर पर इसे पिता, माता, पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन, भतीजा, भतीजी, पोता या पोती या किसी व्यक्ति के जीवनसाथी को शामिल करते हुए समझा जा सकता है। जब आरोप किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ हो जो ब्लड, विवाह या गोद लेने के माध्यम से संबंधित नहीं है, तो अदालतों का कर्तव्य है कि वह परीक्षण करें कि आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए हैं या नहीं? अदालत ने गीता मेहरोत्रा बनाम राज्य यूपी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें यह कहा गया था कि पारिवारिक विवाद में नामों का केवल साधारण संदर्भ बिना सक्रिय भूमिका के आरोप के रूप में अदालत की ओर से संज्ञान लेने को उचित नहीं ठहराता। 

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