एशियाई हॉकी में भारतीय हॉकी की बादशाहत बरकरार
भारत ने बीते कुछ वर्षों में एशियाई हॉकी में अपनी बादशाहत कायम की है। चीन में हुई एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी हॉकी चैंपियनशिप में भारत के लगातार दूसरी बार खिताब जीतने के दौरान भी कोई टीम उसकी बादशाहत को चुनौती देती नहीं दिखी। पेरिस ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम ने दिखाया कि वह अब बिग लीग वाली टीम है और उसे रोक पाना आसान नहीं है। यह जरूर है कि फाइनल में चीन ने हारने से पहले भारतीय टीम की अच्छी परख की, पर वह भारतीय दबदबे को तोड़ने में सफल नहीं हो सकी। यह सही है कि चीन के लिए भारत को मैच के तीन क्वार्टरों में गोल जमाने से रोके रखना जीत पाने की तरह ही है। पर भारत के लिए खुशी की बात यह है कि वह रिकॉर्ड पांचवीं बार खिताब जीतने में सफल हुई है।
भारतीय कोच क्रेग फुल्टोन ने कहा, ‘हमने सातों मैच में अच्छी हॉकी खेली। पेरिस ओलिंपिक के बाद सिर्फ आठ दिन का ब्रेक मिलने की वजह से खिलाड़ी थके हुए भी महसूस कर रहे थे। हम कुछ युवाओं को भी साथ लाये हैं। पर हम जीते, यह अच्छी टीम की निशानी है.’ इस चैंपियनशिप में चीन ने फाइनल में दमदार प्रदर्शन से सभी को चौंकाया। पाकिस्तान भले ही फाइनल में स्थान नहीं बना सका, पर उसने भारत के विरुद्ध बेहतरीन प्रदर्शन किया। उसने यदि यही क्षमता बाकी मैचों में दिखाई होती, तो फाइनल में चीन की जगह वह मुकाबला कर रहा होता। भारतीय हॉकी ने 2019 में ग्राहम रीड के मुख्य कोच बनने के बाद से ही प्रगति पथ पर चलना शुरू कर दिया था और उनके कार्यकाल में ही भारत ने 41 वर्षों बाद टोक्यो ओलिंपिक में हॉकी का पदक जीता था। परंतु 2023 में विश्व कप में खराब प्रदर्शन के बाद उनकी विदाई होने पर दक्षिण अफ्रीकी कोच क्रेग फुल्टोन के मुख्य कोच बनने के बाद से भारतीय टीम ने नयी ऊंचाइयों को छुआ है। क्रेग फुल्टोन का कार्यकाल 2028 के लॉस एंजिल्स ओलिंपिक तक बढ़ाया जाना अच्छा कदम है।
भारतीय हॉकी में ऐसा दौर भी आया था, जब धड़ाधड़ कोच बदले जा रहे थे। इससे खिलाड़ी समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें करना क्या है। पर अब लगता है कि इसमें सुधार आया है. यह वही दौर था, जब भारत 2008 के बीजिंग ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई तक नहीं कर सका था। वर्ष 2012 के लंदन ओलिंपिक में वह अंतिम स्थान पर रहा था। यह वह दौर था जब खराब प्रदर्शन होते ही कोच की छुट्टी करने के साथ दो-चार खिलाड़ियों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था। वहीं इन सबके लिए जिम्मेदार पदाधिकारी अपनी कुर्सी पर जमे रहते थे। परंतु बीते आठ-दस वर्षों में भारतीय हॉकी में बदलाव आया है। सही मायनों में अब तैयारियों को प्रमुखता दी जाती है। इसी का परिणाम है कि हम आज विश्व स्तर पर चमक बिखेर रहे हैं। भारतीय टीम में स्थायित्व आया है। फुल्टोन के समय में एक बात अच्छी दिख रही है कि टीम में एक तरफ जहां मनप्रीत सिंह जैसे अनुभवी खिलाड़ी हैं, वहीं उत्तम सिंह और आराइजीत सिंह जैसे युवा भी हैं। इससे भारत जरूरी दूसरी पंक्ति को तैयार करने में सफल हो रहा है।
भारत को यदि ओलिंपिक और विश्व कप जैसी प्रतिष्ठित चैंपियनशिपों में स्वर्ण पदक जीतना है, तो और तैयारियों की जरूरत होगी। इसके लिए सप्लाई लाइन को और मजबूत करना होगा। मौजूदा समय में देश में क्लब हॉकी लगभग खत्म सी है, इससे सुदूर इलाकों के युवाओं के लिए खेलना अभी भी मुश्किल है। इसलिए हॉकी सुविधाओं को गांव-गांव तक ले जाना जरूरी है। हाल के समय में भारतीय सफलताओं में ड्रैग फ्लिकर हरमनप्रीत सिंह की भूमिका अहम रही है। इस चैंपियनशिप में भी वह सात गोल दागकर चीन के यांग जी हुन (नौ) के बाद दूसरे स्थान पर रहे। पर इस बार भारतीय फॉरवर्डों ने मैदानी गोलों से दिखाया कि जीत में उनकी भूमिका भी अहम है। यह भारतीय हॉकी के लिए अच्छा संकेत है। भारत ने इस चैंपियनशिप में कुल 26 गोल दागे, जिनमें से 18 मैदानी गोल हुए। मैदानी गोलों की संख्या बढ़ने से टीम की हरमनप्रीत सिंह पर निर्भरता कम होगी। पर फिर भी हमें हरमनप्रीत जैसी क्षमता वाले दो-तीन और ड्रैग फ्लिकर तैयार करने की जरूरत है। भारत ने जुगराज को तैयार किया है, पर उनमें भी हरमनप्रीत जैसी क्षमता नहीं है।
भारत ने एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब गोलकीपर श्रीजेश के बिना जीता है। श्रीजेश के संन्यास के बाद यह भारत का यह पहला टूर्नामेंट था। पर उनकी अनुपस्थिति में कृष्ण बहादुर पाठक और सूरज करकेरा, दोनों ने ही अच्छा प्रदर्शन किया है। बेहतर होगा कि श्रीजेश को भारतीय टीम में गोलकीपिंग कोच की भूमिका दी जाए, साथ ही जूनियर गोलकीपरों को तैयार करने की जिम्मेदारी भी सौंपी जाए। इससे ज्यादा बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।