संस्कृति
महामंडलेश्वर श्री करौली शंकर जी ने संतों संग अमर शहीदों को किया नमन, ईंधन बचत का दिया राष्ट्रीय संदेश
भारत की महान संस्कृति में संत समाज ने सदैव राष्ट्रहित, जनकल्याण और सामाजिक जागरूकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। आज जब पूरा विश्व ऊर्जा संकट, प्रदूषण और बढ़ती ईंधन खपत जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारत में भी ईंधन बचत को लेकर व्यापक जनजागरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा चलाए जा रहे ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय प्रयासों को गति देने के उद्देश्य से संत समाज ने इस विशेष पहल में भाग लिया। इसी राष्ट्रीय उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए पूज्यनीय श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर श्री करौली शंकर दास जी महाराज, जगतगुरु स्वामी चक्रपाणी नंदगिरी जी महाराज एवं आचार्य श्री प्रमोद कृष्णन जी ने एक प्रेरणादायक पहल करते हुए अमर जवान ज्योति सार्वजनिक वाहन ऑटो से पहुंचकर देश के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
करौली शंकर महादेव धाम: आस्था और ध्यान से रोगों और कष्टों का अंत
सचिव महंत जगतार मुनि ने साझा किया स्वास्थ्य लाभ का अनुभव
करौली शंकर महादेव बने महामंडलेश्वर
योग, मंत्र दीक्षा, ध्यान साधना व भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं करौली शंकर महादेव : मुखिया महंत भगतराम जी महाराज
भगवान महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर होगा रक्तदान शिविर टिक्कू जैन
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दान की महिमा का पर्व छेर छेरा
-कृष्ण कुमार निगम
लोक परंपरा के अनुसार, *छत्तीसगढ़ में पारंपरिक त्यौहार के रूप में, पौष मास के पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी "तिहार "मनाया जाता है। बाबू रेवाराम की पांडुलिपि में उल्लेख है कि, छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश के कोसल नरेश "कल्याण साय" एवमं मण्डल के राजा के बीच, विवाद हो गया था, जिसके चलते तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर ने कौशल नरेश "कल्याण साय "को दिल्ली बुला लिया था, जहां 8 वर्ष दिल्ली में रहे, एवमं राजनीति व युद्धकाल की शिक्षा प्राप्त कर वापस अपनी राजधानी रतनपुर पहुंचे। उनके आगमन की जानकारी, जब उनकी प्रजा को हुई तो वे अपने राजा से मिलने रतनपुर, पहुँचने लगे। अपने राजा के प्रति, प्रजा के इस प्रेम को, देखकर, उनकी रानी "फुलकेना साय "ने प्रजा के लिए अपनी तिजोरी खोल दी, और खुले मन से दान किया। तब से इस दिन की याद में, प्रति वर्ष, अपने राजा से मिलने, प्रजा आने, आगे चलकर यह एक पारंपरिक त्योहार के रूप में, आम जनमानस में प्रसिद्ध हो गया। यह दिन पौष मास की पूर्णिमा का दिन होता है, जब खेतों की फसल, कटकर खलिहान में, और कोठी में आ, चुकी होती है, अन्न दान के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है, जिसमें लोग घरों - घर जाते हैं, और नृत्य के माध्यम से *छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा कहते हैं।
यह पर्व छत्तीसगढ़ के दान की महिमा को दर्शाता हैं।इस पर्व में गरीब से गरीब परिवार भी अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करता है।इस पर्व के कारण गावों में छोटे बड़े का भेद भाव और अंहकार की भावना समाप्त होती है। आध्यात्मिक महत्व के रूप में यह पर्व नदी सरोवर में स्नान,दीपदान, तीर्थ ,मेला और शिवालय दर्शन के महत्व को भी दर्शाता है।
छेर छेरा की अन्त शुभकामनाएं
25 दिसंबर को *मेरी राधा डे का आयोजन*
मानव जीवन का उद्देश्य और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग
आस्था के माध्यम से जुड़ाव: सोनी सब प्रस्तुत करता है 'गणेश कार्तिकेय' में पवित्र अष्टविनायक गाथा
आस्था के माध्यम से जुड़ाव: सोनी सब प्रस्तुत करता है 'गणेश कार्तिकेय' में पवित्र अष्टविनायक गाथा, जिसे हमारी विरासत से मिली पवित्रता और भक्ति के साथ सुनाया गया है
रुपध्यान है वैदिक मेडिटेेेशन - सुश्री धामेश्वरी देवी
विश्व ध्यान (मेडिटेशन) दिवस पर होगा एक दिवसीय रुपध्यानयुक्त साधना शिविर का आयोजन
क्यों है महापुरुष (गुरु) की आवश्यकता - सुश्री धामेश्वरी देवी
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अलग अलग होता है भीतर और बाहर का संसार - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
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रामकथा के चतुर्थ दिवस मानस विदुषी देवी चंद्रकला ने गरियाबंद के गांधी मैदान में श्री राम जन्म की कथा का रसपान कराया।
राधेश्याम सोनवानी
गरियाबंद :- सत्संग मानस मंडली द्वारा आयोजित राम कथा के चौथे दिन दीदी चंद्रकला ने कहा कि भगवान बांधने की चीज नहीं है , भगवान एक जगह केवल बंधते हैं उसका नाम है प्रेम..इसके अलावा संसार में कोई चीज ऐसी नहीं है जो परमात्मा को बांध सके , बैकुंठ में नहीं निवास मेरा ना योगी हृदय में आता हूँ मेरे भक्त जहां मेरा गान करें मैं वहीं स्वयं को पाया हूं भक्तों के खातिर सब करता मेरे भक्त मेरी दुर्बलता है यदि उन पर आँच कोई भी आए तो विधि विधान भी हिलता है मैं काल परे कल्पना परे मन बुद्धि में नहीं आता हूँ ब्रह्माण्ड अखिल में ना सिमटू पर भक्त हृदय में समाता हूं
हमारे सनातन धर्म में विश्वास की प्रधानता दी गई है , अंधविश्वास की नहीं
धर्म तो एक ही है सनातन धर्म , पंथ अनेक हो सकते हैं , आपको अगर अपने धर्म से प्रेम है तो एक बात याद रखिएगा , आप जिस पर भी आश्रित हैं चाहे वो संत हो चाहे वह गुरु हों मै हाथ जोड़कर बात एक कह रही हूं जीवन में जो व्यक्ति भगवान से मिलने का मार्ग बताए वही सच्चे गुरु होंगे और अगर कोई ये कहे राम नहीं , कृष्ण नहीं , देवी नहीं , शंकर जी नहीं बल्कि जो हैं बस हम हैं तो आज से कान पकड़ के उनसे दूर हो जाईए , वो न संत हो सकते हैं न सतगुरु हो सकते हैं क्योंकि सतगुरु भगवान से मिलने का रास्ता बताता है खुद भगवान नहीं बनता है। आपका कर्तव्य बनता है एसे गुरु का ही आदर् और सम्मान करें जो भगवान से मिलने का रास्ता बताए , उन्होंने कालनेमी हनुमान जी का उदाहरण भी बताया।
सनातन धर्म से दूसरा इस संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं
सदियों की मौन प्रतिक्षा में जब सपने पूरे होते हैं तब रोम रोम रो उठता है केवल दो नयन न रोते हैं, स्वाभिमान की रक्षा की जब कीमत बलिदान चुकाता है तब जाकर हम लोगों को ये शुभ दिन भगवान दिखाता है , हम है गवाह इन घड़ियों के हथकडियों से मजबूर नहीं पुष्पक विमान आकाश में हैं अब राम हमारे दूर नहीं, सत्कार आस्था का करिए युग बीत गए जो बनी रही।
हिंदुस्तान के लिए बड़े गर्व का क्षण था जब कितने वर्षों के बाद ये वो पल आया जब अयोध्या धाम में हमारे राम लला अपने निज महल में विराजमान हुए ।
भगवद् कृपा से ही बुद्धि जान सकेगी भगवान को - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
भगवद् कृपा से ही बुद्धि जान सकेगी भगवान को - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी के 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन
प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी के 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन
महापुरुषों का अपमान समाज को बुरा तो लगेगा ही
सच यह है कि महापुरुष तो पूरे मानव समाज का होता है, यानी हर समाज का होता है, पूरे राज्य का होता है, पूरे देश का होता है। उसे किसी समाज या राज्य के दायरे में नहीं रखना चाहिए, यह नहीं मानना चाहिए कि वह हमारे समाज का ही है। महापुुरुष भले ही किसी परिवार व समाज में पैदा होते हैं लेकिन काम तो वह पूरे मानव समाज के हित में करते हैं। इसलिए वह सभी के लिए महापुरुष होने चाहिए। सभी को उनको महापुरुष मानना चाहिए। उनका अपमान किसी भी तरह से नहीं करना चाहिए।कोई अपमान करता है तो सभी लोगों को उसका विरोध करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि समाज विशेष के लोग ही इस बात का विरोध करें और बाकी समाज के लोग मूकदर्शक बने रहे।
हर राज्य में कई समाज के लोग होते हैं।हर समाज में दूसरे समाज से अपने समाज को जोड़ने व दूसरे समाज से खुद को तोड़ने वाले लोग भी होते हैं।समाज को जोड़ने वाले जो लोग होते हैं, वह दूसरे समाज से अपने समाज को जोड़ते हैं। दूसरे समाज के लोगों का सम्मान करते हैं, उनके तीज त्यौहार में उनसे मिलते है, उनको शुभकामनाएं देते हैं, उनके जुलूस,रैली का स्वागत करते हैं।उनके महापुरुषों का सम्मान करते हैं। समाज जब दूसरे समाज का सम्मान करता है तो दोनों समाज के बीच अच्छे संबंध बनते है, दोनों समाज के लोग एक दूसरे का सम्मान करते हैं, एक दूसरे के महापुरुषों का सम्मान करते हैं। सम्मान करने से सम्मान मिलता है राज्य में सद्भाव बना रहता है।
सभी समाजों मे समाज जोड़ने वाले लोगों के अलावा समाज को तोड़ने वाले लोग भी होते हैं। ऐसे लोग जब समाज में प्रभावी हो जाते हैं, वह संगठन बना लेते हैं तो इसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है, थोड़े से तोड़ने वाले लोगों को कारण माना जाता है कि पूरा समाज ही ऐसा है,हकीकत मे सब समाज में जोड़ने वाले ज्यादा होते है और तोड़ने वाले कम होते हैं, इसलिए समाज के बहुसंख्यक लोगों की यह जिम्मेदारी होती है कि वह समाज को तोड़ने वाले लोग कुछ गलत करते हैं तो उनको खुल कर कहें कि आप लोग यह काम गलत कर रहे हो। इससे पूरे समाज की इमेज खराब होती है,समाज की बदनामी होती है।कई बार ऐसा होता है कि समाज को जोड़ने वाले लोग चुप रह जाते हैं तो समाज के तोड़ने वालों को लगता है कि उन्होंने जो किया है सही किया है जो कहा है सही कहा है।
हाल ही में तेलीबांधा में छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा किसी मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति ने तोड़ दी तो सभी लोगों ने इसकी निंदा की,सबने इसे गलत कहा, सबने इसे छत्तीसगढ़ का अपमान कहा।सबने इसे गंभीरता से लिया, सभी लोगों गलत हुआ तो गलत कहा।यह राज्य के सम्मान जुडा़ हुआ मामला था तो सरकार ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया और २४ घंटे के अंदर दोषी व्यक्ति को गिरप्तार करने के साथ ही छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा वहीं पर स्थापित कर दी।इस मामले को लेकर भी राजनीति करने वालों ने राज्य के लोगों को दो भागों में बांटने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहे, राज्य के लोग इस मामले में एकजुट रहे। इसी तरह राज्य के लोगों को किसी भी समाज या समाजों के महापुरुषों का कोई संगठन या किसी संगठन का नेता करता है तो राज्य के लोगों को इसे मुखर होकर कहना चाहिए कि ऐसा जिसने भी किया है, गलत किया है. सभी राजनीतिक दलों व सभी संगठनों के लोगों को गलत करने वालो से कहना चाहिए कि आपने महापुरुषों का अपमान कर गलत किया है।गलती करने वाले को सब लोग जब गलती करने का एहसास कराते हैं तो उसको पता चलता है कि उससे गलती हो गई है।
एक तो गलती का एहसास सभी लोगों को कहकर कराना चाहिए। ऐसा नहीं होता है तो दूसरा रास्ता यह बचता है कि जिन समाज के महापुरुषों का अपमान किया गया है,वह कानून के रास्ते गलत कहने व करने वाले को सजा दिलाए।इसके लिए गलत कहने वाला व्यक्ति के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराना चाहिए और उसे सजा दिलाने का प्रयास करना चाहिए ताकि उसे एहसास हो कि उसने जो किया था, वह गलत था, वह अपराध था।महापुरुषों का अपमान किया जाए को समाज के लोगों को बुरा तो लगेगा ही।इससे समाजों के बीच दूरी बढ़ती है, दूसरे समाज भी आपके महापुरुषों का अपमान करेंगे। इससे समाज में सद्भभाव बिगड़ेगा। जब समाज में सद्भाव नहीं रहता है, राज्य में सद्भाव नहीं रहता है तो उसका खामियाजा सभी समाज के लोगों को भुगतना पड़ता है। कुछ लोग चाहते हैं कि समाज में,राज्य में सद्भाव न रहे ऐसे लोगों से राज्य के सभी समाज व संगठन के लोगों को सावधान रहना चाहिए।
छठ महापर्व: शनिवार से शुरू हुआ नहाय-खाय, चार दिन तक चलेंगे धार्मिक अनुष्ठान
नहाय-खाय के साथ 25 अक्टूबर से छठ महापर्व का शुभारंभ हो गया है। यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मइया की आराधना के लिए मनाया जाता है और चार दिन तक चलता है। रविवार, 26 अक्टूबर को श्रद्धालु खरना का आयोजन करेंगे। इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को खीर या अन्य प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सोमवार, 27 अक्टूबर को संध्या अर्ध्य किया जाएगा। सूर्य देव की पूजा शाम के समय पानी के किनारे या घर पर आयोजित होगी। मंगलवार, 28 अक्टूबर को प्रातः अर्घ्य के साथ पूजा का समापन होगा, जिसमें व्रती सूर्योदय के समय नदी या तालाब में अर्घ्य देकर उपवास तोड़ते हैं।
छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालु शुद्धता और संयम का विशेष ध्यान रखते हैं और पारंपरिक नियमों का पालन करते हैं।
नहाय-खाय और भद्रावास योग
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नहाय-खाय का दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है।
इस दिन भद्रावास योग दोपहर 2:34 बजे से रात तक प्रभावी रहेगा।
इस समय किए गए धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ विशेष फलदायी माने जाते हैं।
व्रती इस दिन पवित्रता बनाए रखते हुए भोजन करते हैं और पूजा का पालन करते हैं।
संध्या अर्ध्य: अतिगण्ड योग और सुकर्मा योग
सोमवार, 27 अक्टूबर को संध्या अर्ध्य के दिन दो प्रमुख योग बन रहे हैं:
अतिगण्ड योग – यह थोड़े समय के लिए प्रभावी होगा।
सुकर्मा योग – पूरे दिन और रात्रि तक प्रभावी रहेगा।
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार ये योग छठ महापर्व के लिए अत्यंत शुभ हैं। इस दौरान की गई पूजा और अनुष्ठान से जीवन में सकारात्मक बदलाव, सुख-समृद्धि और सफलता मिलने की संभावना अधिक होती है।
पूजा का महत्व और भक्तों का उत्साह
छठ महापर्व शुद्धता, संयम और श्रद्धा का प्रतीक है।
श्रद्धालु नदी, तालाब या घर में अर्घ्य देकर जीवन में शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
पर्व के दौरान परिवार और समाज में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का संचार होता है।
विशेष रूप से, यह पर्व प्रकृति और सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त करने का भी अवसर है।