छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

कथित डॉक्टर की लापरवाही से गरीब महिला की किडनी फेल — इलाज नहीं, जवाबदेही से भागा सिस्टम!

 कवर्धा :-  विकास खंड पंडरिया  के कुकदुर वनांचल क्षेत्र के ग्राम ग्राम कुई में स्वास्थ्  तंत्र की घोर लापरवाही का एक दर्दनाक मामला सामने आया है ।

बवासीर से पीड़ित महिला ने  स्थानीय निजी हस्पताल कुई इलाज करने पहुंच गई । पीड़िता के परिजन ने बताया गलत ढंग से  इलाज करने के कारण  दोनों किडनियाँ फेल हो गईं, माली हालत खराब हो गया है। जो धन संपति इलाज में पूरा खर्च हो गई  परिवार अब कर्ज़ में डूब गया है। पीड़िता की जान को पूर्णतः खतरा है ।पीड़ित परिवार  न्याय की गुहार लगा रहा है।
 
गलत तरीके से इलाज हुआ ग्राम कुकदुर निवासी जगदीश पनारिया ने बताया कि उनकी पत्नी जिरा  बाई पनारिया को बवासीर की शिकायत थी। उपचार के लिए वे स्थानीय निजी हॉस्पिटल कुई लेकर पहुँचे, जहाँ उपस्थित डॉ.  ने कहा कि “खून की कमी है”, और तुरंत दो यूनिट खून की बोतल चढ़ा दी गई। जो जांच का विषय बनाता है।
इसके बाद 27 से 30 अगस्त 2025 तक रोज़ाना सुबह, दोपहर और शाम को ₹1950 की इंजेक्शन लगाए गए।

इंजेक्शन लगने के चार दिन बीतने के बाद महिला ठीक की होने के बजाए और हालत गंभीर होती गई। जब परिजनों ने डॉ . से विनती की अगर यहाँ इलाज संभव न हो तो उसे रायपुर रिफर कर दें, तो    डॉक्टर ने कहा — “कुछ नहीं होगा, ठीक हो जाएगी।” लेकिन हालत और बिगड़ गई। मजबूर होकर जगदीश पनरिया ने एंबुलेंस से  अपनी पत्नी को रायपुर के V Y हॉस्पिटल पहुँचाया। वहाँ डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि गलत दवा और इंजेक्शन देने से दोनों किडनियाँ फेल हो गई हैं, अब डायलिसिस के बिना जान बचाना मुश्किल है। लंबी खर्च और ईलाज के बाद भी जान जोखिम में है । गरीब परिवार आर्थिक तंगी से तो जूझ ही रहा है। साथ ही जान जाने की खतरा से  भी भयभीत हैं ।


 गरीब को आर्थिक तंगी, कर्ज़ और इलाज की विवशता

जगदीश ने कहा,मैं मजदूरी कर के परिवार पालता हूँ। अब हर हफ्ते बिलासपुर के  अस्पताल में डायलिसिस कराने के लिए कर्ज लेकर जाना पड़ता है। अब तक चार लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, घर गिरवी रखने की नौबत आ गई है। डॉक्टर की गलत ईलाज  के चलते भुगतना  हमें पड़ रहा है। मेरी पत्नी की जान जोखिम में है।

लिखित शिकायत पर कार्रवाई नहीं

पीड़ित ने थाना कुकदुर, जिला कलेक्टर, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देकर डॉ.  पर कार्रवाई की मांग की है।
लेकिन अब तक किसी स्तर पर कोई जांच या कार्रवाई शुरू नहीं हुई है। यह चुप्पी उस प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है जो गरीब की जान को सस्ती और डॉक्टर की गलती को मामूली समझती है।

बड़ा सवाल — हॉस्पिटल क्लिनिक वैध रजिस्ट्रेशन है? क्लिनिक स्टेब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन और रेगुलेशन एक्ट 2010  तहत पंजीकृत है या नही । इस अस्पताल में 
 प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ हैं या फिर यह झोलाछाप क्लिनिक है जो ग्रामीणों की ज़िंदगी से खेल रहा है? ।
कई बार जिला प्रशासन की बैठक में आवाज उठाई गई
 
जिले में कई ऐसे निजी अस्पताल हैं । जिनके पास कोई सुविधा नही है। इलाज के नाम पर डॉ . नाम लिखकर अस्पताल खोलकर धंधा चला रहे हैं। मरीज के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जब तक कोई मामला सामने नहीं आता है तब तक कोई सुनने वाला नही है। स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे क्लिनिकों की जाँच करे,
लेकिन विभाग मूकदर्शक बना हुआ है। ऐसे में यह कहना सही है।
क्या सरकारी सिस्टम तब ही जागेगा जब किसी और की जान चली जाएगी?

ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रहार

यह मामला सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की हकीकत उजागर करता है —
जहाँ झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम इलाज कर रहे हैं,
प्रतिबंधित दवाओं का उपयोग हो रहा है,
गर्भपात तक अवैध रूप से कराए जा रहे हैं,
और सब कुछ स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा है।
यदि अब भी सरकार ने कार्रवाई नहीं की, तो यह “जन स्वास्थ्य प्रणाली” नहीं बल्कि “जन हत्या तंत्र” है।  गरीब की कोई सुनवाई नही होगी तो आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार कोर्ट कचहरी का बोझ कैसे उठाएगा । शायद इस का लाभ भी नियम विरुद्ध चलाए जा रहे क्लिनिक संचालक उठा रहे हैं।

 

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