बालोद। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उत्साह के बीच छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के दल्ली राजहरा में 21 दिसंबर को एक भव्य हिंदू सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हिंदुत्व की जागृति और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का माध्यम बना, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। मुख्य अतिथि के रूप में रामनामी समाज के प्रमुखों की मौजूदगी ने इसे विशेष महत्व प्रदान किया, जबकि विशेष अतिथियों में श्रीकृष्ण शुभम महाराज (कथावाचक), डॉ. वर्णिका शर्मा (राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच) और जितेन्द्र शर्मा (विभाग प्रचारक) की गरिमापूर्ण भागीदारी रही। आयोजन ने समाज में एकता और जागरूकता का संदेश प्रसारित किया, जो आरएसएस के 100 वर्षों के सफर को स्मरण कराने वाला था।
कार्यक्रम का शुभागमन माँ भारती तथा छत्तीसगढ़ महतारी के प्रतिबिंबों पर पुष्पमाला चढ़ाकर और दीपक जलाकर संपन्न हुआ। मंच पर विभिन्न समाजों के प्रतिष्ठित सदस्य विराजमान थे। संपूर्ण समारोह का संयोजन कृष्णा साहू ने कुशलतापूर्वक किया। बाल कलाकारों ने लोक परंपराओं से प्रेरित नृत्य प्रदर्शन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसी क्रम में सरस्वती शिशु मंदिर के विद्यार्थियों ने भारत की प्राचीन विरासत और योग की महत्ता पर प्रभावशाली प्रस्तुतियां देकर वातावरण में उत्साह का संचार किया।
डॉ. वर्णिका शर्मा ने अपने वक्तव्य में हिंदुत्व की व्याख्या करते हुए "हिन्दू कौन है" के सवाल पर प्रकाश डाला और पांच प्रमुख प्रबोधनों को विस्तृत रूप से स्पष्ट किया। रामनामी समाज के प्रतिनिधियों ने शाकाहारी आहार के महत्व तथा भगवान श्रीराम के आदर्शों पर आधारित जीवनशैली का संदेश दिया। श्रीकृष्ण शुभम महाराज ने हिंदुत्व को व्यक्तिगत जीवन में कैसे समाहित किया जाए, इस पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया। जितेन्द्र शर्मा ने अपने संबोधन में ऐतिहासिक संदर्भ दिए, जहां उन्होंने गुलामी की अवधि में प्रचलित विकृत मानसिकता का जिक्र किया, जैसे "गधा कह लो, पर हिन्दू मत कहो" वाली सोच। उन्होंने बताया कि इसी मानसिकता के विरुद्ध डॉ. हेडगेवार जी ने एक व्यापक जनजागरण की शुरुआत की, जो आज "कहो हम हिन्दू हैं" के नारे के साथ एक विशाल आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो चुका है।
समापन के अवसर पर आयोजन समन्वयक सौरभ लुनिया ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया। समाज प्रमुखों को पारंपरिक गमछा तथा माँ भारती का चित्र भेंटकर सम्मानित किया गया। इसके पश्चात माँ भारती एवं छत्तीसगढ़ महतारी की आरती उतारी गई, उसके बाद सात्त्विक भोजन प्रसाद के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। यह सम्मेलन न केवल आरएसएस के शताब्दी वर्ष को चिह्नित करने वाला था, बल्कि हिंदू समाज में एकजुटता और सांस्कृतिक जागरण का प्रतीक भी बन गया।