छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

ताले में कैद पशु औषधालय, सड़क पर तड़पकर मरती बछिया — महराजपुर में सरकारी लापरवाही की क्रूर तस्वीर

 कवर्धा ,

जहाँ सरकार पशु कल्याण और ग्रामीण विकास के दावे करती नहीं थकती, वहीं महराजपुर में पशु चिकित्सा व्यवस्था की सच्चाई बेहद शर्मनाक और अमानवीय रूप में सामने आई है। सड़क पर घायल बछिया घंटों तड़पती रही और अंततः दम तोड़ दिया, लेकिन पशु औषधालय (नया), महराजपुर का ताला नहीं खुला।

घटना के दौरान ग्रामीणों ने जिम्मेदारी निभाते हुए पशु चिकित्सक को बार-बार फोन लगाया। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन डॉक्टर ने कॉल उठाना मुनासिब नहीं समझा। न इलाज मिला, न संवेदना — सिर्फ़ सिस्टम की बेरुखी।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि लाखों रुपये की लागत से बना पशु औषधालय भवन आज सिर्फ़ “शोपीस” बनकर रह गया है। भवन मौजूद है, सुविधाएं कागजों में हैं, लेकिन डॉक्टर मुख्यालय से नदारद हैं। ताले में बंद औषधालय ग्रामीणों के लिए किसी धोखे से कम नहीं।

क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह पहली घटना नहीं है। कई बार ऐसी स्थिति बनी, लेकिन हर बार सरकारी उदासीनता और गैर-जिम्मेदारी ही सामने आई। पशु, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, उनके जीवन की कीमत इस व्यवस्था में शून्य होती जा रही है।

महराजपुर की यह घटना न सिर्फ़ एक बछिया की मौत है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का पोस्टमार्टम है। सवाल साफ़ है —
 जब डॉक्टर मुख्यालय से गायब हैं तो जवाबदेह कौन।
 जब ताले नहीं खुलते तो भवन पर खर्च क्यों ।
और जब जान चली जाए, तब जांच का क्या मतलब।

आज महराजपुर में लाखों का औषधालय भवन ग्रामीणों की उम्मीदों पर विराम बन चुका है — एक ऐसा स्मारक, जो सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को बेनकाब करता है।

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