सहसपुर लोहारा/कवर्धा--
जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत ग्राम पंचायत पटपर के आश्रित ग्राम रेंगाटोला में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत निर्माणाधीन पुलिया कार्य अब गंभीर विवादों के घेरे में आ गया है। ग्रामीणों ने निर्माण कार्य में भारी अनियमितता, गुणवत्ता से समझौता और नियमों की खुली अनदेखी के आरोप लगाए हैं। मौके से सामने आ रही जानकारी यह संकेत दे रही है कि पुलिया निर्माण कार्य में न केवल तकनीकी मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, बल्कि शासन के पारदर्शिता संबंधी नियमों को भी दरकिनार किया जा रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिया निर्माण में उपयोग की जा रही सामग्री की गुणवत्ता बेहद खराब है। निर्माण स्थल पर जिस तरह कार्य किया जा रहा है, उससे यह आशंका गहरा गई है कि निर्माण पूरा होने के कुछ समय बाद ही पुलिया में दरारें, धंसाव या क्षति दिखाई दे सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अभी से निर्माण की गुणवत्ता इतनी कमजोर है, तो बरसात और भारी जलप्रवाह के दौरान यह पुलिया कितनी सुरक्षित रहेगी, यह बड़ा सवाल है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निर्माण स्थल पर नागरिक सूचना पटल तक प्रदर्शित नहीं किया गया है। मनरेगा योजना के तहत होने वाले प्रत्येक निर्माण कार्य में सूचना पटल लगाना अनिवार्य होता है, जिसमें कार्य का नाम, स्वीकृत राशि, लागत, कार्य अवधि, तकनीकी स्वीकृति, एजेंसी तथा मजदूरी एवं सामग्री मद का विवरण सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य पारदर्शिता बनाए रखना और जनता को जानकारी उपलब्ध कराना है। लेकिन रेंगाटोला में यह अनिवार्य नियम खुल्लमखुल्ला ताक पर रख दिया गया है।
सूचना पटल का न होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर कार्य की स्वीकृत लागत क्या है? कितनी राशि सामग्री में खर्च हो रही है? कितने मजदूर नियोजित हैं? तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने दी? इन सभी मूलभूत जानकारियों को सार्वजनिक न करना सीधे-सीधे संदेह को जन्म देता है। ग्रामीणों का कहना है कि जब शुरुआत से ही जानकारी छिपाई जा रही है, तो कहीं न कहीं गड़बड़ी की आशंका स्वाभाविक है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि निर्माण कार्य की नियमित तकनीकी निगरानी नहीं हो रही। संबंधित उपयंत्री, तकनीकी सहायक और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि अधिकारी समय-समय पर स्थल निरीक्षण कर रहे होते, तो गुणवत्ता और नियमों की इस तरह अनदेखी संभव नहीं होती। इससे यह शंका और मजबूत होती है कि कहीं जिम्मेदारों की मौन सहमति से यह पूरा खेल तो नहीं चल रहा।
मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्थायी और गुणवत्तापूर्ण परिसंपत्तियों का निर्माण करना है। लेकिन जब ऐसी योजनाओं में भी भ्रष्टाचार, लापरवाही और मनमानी हावी होने लगे, तो योजना का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। सरकारी धन आखिर जनता का पैसा है, और यदि वही पैसा घटिया निर्माण में खपाया जाएगा, तो इसका नुकसान सीधे ग्रामीणों को उठाना पड़ेगा।
रेंगाटोला के ग्रामीणों में इस मामले को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि यदि जल्द निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह पुलिया भी उन अनेक निर्माण कार्यों की सूची में शामिल हो जाएगी जो कागजों में मजबूत और जमीनी हकीकत में खोखले साबित हुए। ग्रामीणों ने मांग की है कि पुलिया निर्माण की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की जांच हो तथा कार्य से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा और ग्राम पंचायत पटपर के जिम्मेदार अधिकारी इस मामले पर कब संज्ञान लेंगे? क्या नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाने वालों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा? रेंगाटोला के ग्रामीण जवाब चाहते हैं—और इस बार केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं।