16 लाख नगद बरामद, बाकी रकम की तलाश में जांच, धान खरीदी घोटाले में बड़े नेटवर्क और सफेदपोशों की भूमिका की आशंका
कबीरधाम |
2026-07-11 18:13:12
-केवल 20प्रतिशत राशि जप्त हुई 80 फीसदी है कहाँ?-
"विकाश शुक्ला"
कवर्धा
जिले के सहसपुर लोहारा क्षेत्र में धान खरीदी से जुड़े आर्थिक अनियमितता के मामले ने अब बड़े घोटाले का रूप ले लिया है। धान उपार्जन केंद्र सहसपुर लोहारा, बासिनझोरी और बिरनपुर कला में शासन को 81 लाख 19 हजार 502 रुपये की आर्थिक क्षति पहुंचाने के मामले में पुलिस ने समिति प्रबंधक गंगादास मानिकपुरी सहित फड़ प्रभारियों और कंप्यूटर ऑपरेटरों के विरुद्ध अपराध दर्ज किया है। जांच के दौरान समिति प्रबंधक के घर से करीब 16 लाख रुपये नगद मिलने के बाद पूरे मामले को लेकर कई नए पहलुओं पर चर्चा शुरू हो गई है।
सबसे बड़ा मुद्दा यह बन गया है कि जब समिति प्रबंधक के घर से इतनी बड़ी नकद राशि बरामद हुई है, तब शेष रकम का प्रवाह किन लोगों तक पहुंचा और इस कथित अनियमितता से किस-किस को लाभ मिला। स्थानीय स्तर पर इस पूरे प्रकरण को एक संगठित नेटवर्क के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें केवल एक व्यक्ति की भूमिका मानना जांच को सीमित करना माना जा रहा है।
पुलिस जांच के अनुसार संयुक्त जांच दल के आकस्मिक निरीक्षण में पाया गया कि खरीफ विपणन वर्ष 2025-26 के दौरान धान खरीदी और खाली बारदानों के प्रबंधन में गंभीर गड़बड़ियां हुईं। प्रथम दृष्टया मामला अमानत में खयानत तथा शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का पाए जाने पर अलग-अलग अपराध पंजीबद्ध किए गए हैं।
मामले में आरोपी बनाए गए लोगों में समिति प्रबंधक गंगादास मानिकपुरी, फड़ प्रभारी बलदाउ डडसेना, कंप्यूटर ऑपरेटर बिहारी राम साहू, फड़ प्रभारी तुकाराम साहू, कंप्यूटर ऑपरेटर पीलूराम साहू तथा कंप्यूटर ऑपरेटर महावीर साहू शामिल हैं। सभी आरोपियों की भूमिका अब जांच के केंद्र में है।
जानकारों का मानना है कि यदि तीन अलग-अलग धान उपार्जन केंद्रों में इतनी बड़ी आर्थिक अनियमितता सामने आई है, तो इसकी परतें केवल दस्तावेजी गड़बड़ी तक सीमित नहीं हो सकतीं। धान खरीदी के दौरान हुए वित्तीय लेन-देन, कथित कमीशन व्यवस्था और विभिन्न स्तरों पर हुए संपर्कों की गहन जांच से पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
जांच एजेंसियों के लिए अब आरोपियों के मोबाइल फोन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, बैंक खातों और मोबाइल लोकेशन की जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। धान खरीदी अवधि के दौरान किन-किन लोगों से लगातार संपर्क हुआ, किसे कथित रूप से लाभ पहुंचाया गया और किन लोगों के संरक्षण में यह पूरा तंत्र संचालित हुआ, इसकी पड़ताल से कई अहम तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार यदि सभी आरोपियों के घरों में भी छापामार कार्रवाई की जाती है तथा बैंक खातों और संपत्तियों की जांच की जाती है, तो कथित आर्थिक नुकसान की राशि के वास्तविक प्रवाह का पता चल सकता है। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि क्या इस पूरे प्रकरण में अन्य लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे।
मामले ने विभागीय कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमित निरीक्षण, स्टॉक सत्यापन और निगरानी व्यवस्था के बावजूद तीन धान उपार्जन केंद्रों में इतनी बड़ी गड़बड़ी सामने आना यह दर्शाता है कि निगरानी तंत्र कहीं न कहीं कमजोर रहा है या फिर जांच के दायरे में आने योग्य अन्य पहलू भी मौजूद हैं।
क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि यदि निष्पक्ष और गहन जांच की गई, तो कुछ सफेदपोश लोगों और विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी उजागर हो सकती है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन परिस्थितियां इस संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं करती हैं।
इधर पुलिस द्वारा समिति प्रबंधक गंगादास मानिकपुरी के घर से 16 लाख रुपये नगद, विभिन्न बैंकों की पासबुक, लैपटॉप और सीपीयू जब्त किए जाने के बाद मामले की गंभीरता और बढ़ गई है। सभी आरोपी फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं और उनकी तलाश जारी है।
अब जिले की जनता की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रहती है या फिर धान खरीदी प्रक्रिया से जुड़े पूरे नेटवर्क, वित्तीय लेन-देन, मोबाइल संपर्क और कथित संरक्षण तंत्र की भी गहन पड़ताल की जाती है। यदि जांच सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर आगे बढ़ती है, तो यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता नहीं बल्कि संगठित अपराध और व्यापक नेटवर्क से जुड़े एक बड़े घोटाले के रूप में भी सामने आ सकता है।