छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

**पारदर्शिता का पूरा डोल पीटा लेकिन यथार्थ धरातल पर नजर आता नही ! बडौदा कला में ‘रिटर्निंग वाल’ का खेल: सूचना पटल पर 25 अप्रैल पूर्णता, जमीन पर हफ्ते भर से बंद काम—32 मजदूर, 4 मस्टरोल और मशीन का साया!”

 कवर्धा, 

जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत ग्राम पंचायत बडौदा कला में मनरेगा के तहत स्वीकृत ‘रिटर्निंग वाल’ निर्माण कार्य गंभीर अनियमितताओं के आरोपों में घिर गया है। स्थल पर लगे नागरिक सूचना पटल में स्पष्ट रूप से अंकित है कि कार्य महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (छ.ग.) अंतर्गत स्वीकृत है। बोर्ड पर कार्य की प्रारंभ तिथि 24.02.2026 तथा पूर्णता तिथि 25.04.2026 दर्शाई गई है। साथ ही स्वीकृत राशि, तकनीकी सहायक, कार्यक्रम अधिकारी, संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों और टोल-फ्री नंबर का उल्लेख भी दर्ज है—मानो पारदर्शिता का पूरा खाका प्रस्तुत किया गया हो।

लेकिन 24 अप्रैल को मौके पर पहुंचने पर निर्माण स्थल पर कार्य पूर्णतः बंद मिला। ग्रामीणों के अनुसार काम लगभग एक सप्ताह पूर्व ही रुक चुका है। ऐसे में जब सूचना पटल पर 25 अप्रैल पूर्णता तिथि अंकित है, तो बड़ा सवाल यह है कि शेष अवधि का कार्य किस आधार पर दर्शाया जा रहा है । क्या उन दिनों के लिए भी मस्टरोल में उपस्थिति दर्ज कर भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

जानकारी के मुताबिक 32 मजदूरों के नाम पर 4 मस्टरोल जारी किए गए हैं। मनरेगा अधिनियम, 2005 की धारा 3 के तहत ग्रामीण परिवारों को 100 दिनों का अकुशल श्रम आधारित रोजगार उपलब्ध कराना अनिवार्य है। संचालन दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि कार्य मानव श्रम प्रधान होगा और मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित रहेगा। ग्रामीणों का आरोप है कि ‘रिटर्निंग वाल’ का निर्माण मशीनों से कराया गया। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है, तो यह अधिनियम की मूल भावना के विपरीत और सरकारी राशि के संभावित दुरुपयोग का मामला बनता है।

नागरिक सूचना पटल का उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना होता है—ताकि जनता जान सके कि कार्य की लागत, अवधि और जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं। लेकिन जब बोर्ड पर अंकित तिथियां और जमीनी वास्तविकता में स्पष्ट अंतर नजर आए, तो यह पूरी निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। क्या यह केवल कागजी उपलब्धि दिखाने का प्रयास है।

यदि कार्य पूर्व में ही बंद हो चुका था और मस्टरोल जारी रहा, तो यह फर्जी उपस्थिति, कूटरचना और वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आएगा। ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की प्रासंगिक धाराओं—जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी एवं कूटरचित दस्तावेज के उपयोग से संबंधित प्रावधान—के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किए जा सकते हैं। साथ ही छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम और वित्तीय नियमों के तहत संबंधित अधिकारियों पर निलंबन, सेवा समाप्ति एवं राशि वसूली की कार्रवाई संभव है।

गौरतलब है कि मनरेगा के जिला स्तरीय क्रियान्वयन एवं निगरानी समिति के अध्यक्ष स्वयं कलेक्टर होते हैं। ऐसे में जब जिला प्रदेश में मनरेगा क्रियान्वयन में प्रथम स्थान प्राप्त करने का दावा कर रहा है, तो सहसपुर लोहारा के बडौदा कला में सामने आया यह विरोधाभास प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा करता है। क्या मस्टरोल का भौतिक सत्यापन हुआ क्या तकनीकी स्वीकृति और माप पुस्तिका का मिलान किया गया।

‘रिटर्निंग वाल’ जैसे कार्य ग्रामीण परिसंपत्तियों की सुरक्षा और मिट्टी कटाव रोकने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन यदि इन्हीं कार्यों में कागजी मजदूरी और मशीन आधारित निर्माण के आरोप लगें, तो यह न केवल योजना की साख को आघात है, बल्कि उन मजदूरों के अधिकारों पर भी चोट है जिनके नाम पर रोजगार दिखाया गया।

अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। क्या 32 मजदूरों के नाम पर जारी 4 मस्टरोल की विस्तृत जांच होगी? क्या दोषियों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई होगी । बडौदा कला का यह मामला अब केवल एक पंचायत का नहीं, बल्कि मनरेगा की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही की असली परीक्षा बन चुका है।

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