सुदूर वनांचल ग्राम चिचगांव के किसान ने जैविक खेती से लिखी सफलता की नई इबारत
एम.ए. शिक्षित होकर भी खेती को बनाया आजीविका का माध्यम
10 एकड़ में विविध जैविक खेती से हो रही सालाना 08 लाख रुपये से अधिक की आय
उत्तर बस्तर कांकेर, 09 जुलाई 2026
जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्र के आमाबेड़ा तहसील के ग्राम चिचगांव के किसान श्री सोनूराम धु्रव आज उन किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद खेती में नई संभावनाएं तलाशना चाहते हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने नौकरी की बजाय खेती को अपने व्यवसाय के रूप में चुना और पूरी तरह जैविक खेती अपनाकर यह साबित कर दिया कि वैज्ञानिक सोच, परंपरागत ज्ञान और दृढ़ संकल्प साथ हों तो गांव में रहकर भी आत्मनिर्भर बना जा सकता है।
चिचगांव के जैविक किसान श्री सोनूराम धु्रव ने एम.ए. (अर्थशास्त्र) की पढ़ाई पूरी की है। उनके पास लगभग 10 एकड़ कृषि भूमि है, जहां वे पूरी तरह जैविक एवं समन्वित कृषि प्रणाली अपनाते हैं। वे राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम ¼NPOP) के अंतर्गत प्रमाणित किसान हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ प्रमाणीकरण समिति, भारत वानिकी एवं कृषि द्वारा निरीक्षण के बाद जैविक खेती का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया है।
वर्ष 2015 से शुरू किया जैविक खेती का सफर
श्री धु्रव बताते हैं कि आज से लगभग 11 साल पहले उन्होंने वर्ष 2015 से जैविक खेती की शुरुआत की थी। प्रारम्भिक चरण में चुनौतियां जरूर थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज उनके खेत में ड्रिप सिंचाई प्रणाली सहित आधुनिक जल प्रबंधन की व्यवस्था है, जिससे कम पानी में बेहतर उत्पादन प्राप्त हो रहा है। वे 10 एकड़ भूमि में विविध प्रकार की फसलें उगाते हैं। इनमंम लगभग 4 एकड़ में 100 प्रतिशत जैविक चिन्नौर धान की खेती करते हैं। इसके साथ ही वे ब्लैक राइस (काला धान) का भी उत्पादन करते हैं। इस वर्ष उन्होंने 400 पौधे काली मिर्च के लगाए हैं, जिनमें अब फल आना शुरू भी हो गया है। इसके अलावा वे गेहूं, उड़द, कुल्थी, रागी, काली हल्दी, आम सहित कई अन्य फसलों की खेती करते हैं तथा गौ-पालन भी करते हैं। इससे उनकी खेती पूरी तरह समन्वित एवं टिकाऊ बन गई है।
वृक्ष आयुर्वेद और पंचमहाभूत आधारित खेती
श्री ध्रुव अपनी खेती में ताराचंद बेलजी तकनीक का उपयोग करते हैं, जिसे वे वृक्ष आयुर्वेद आधारित प्राकृतिक खेती बताते हैं। यह पद्धति पंचमहाभूत- भूमि, गगन, वायु, अग्नि और जल के सिद्धांतों पर आधारित है। उनका मानना है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खेती करने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और फसलें अधिक पौष्टिक व उपजाऊ होती हैं।
घर में तैयार करते हैं जैविक रसायन
श्री ध्रुव ने बताया कि खेत और आसपास उपलब्ध स्थानीय संसाधनों जैसे नींबू, पपीता, हर्रा तथा अन्य प्राकृतिक पदार्थों से स्वयं जैविक घोल एवं जैविक रसायन तैयार करते हैं। इनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सकता है। बीज से लेकर खाद और कीटनाशक तक वे अधिकांश सामग्री स्वयं तैयार करते हैं, जिससे खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है।
प्रधानमंत्री के आह्वान से मिली प्रेरणा
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा जैविक खेती को बढ़ावा देने के आह्वान से उन्हें विशेष रूप से प्रेरणा मिली। उनका मानना है कि रासायनिक खेती से मिट्टी और मानव स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं, जबकि जैविक खेती से पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न का उत्पादन संभव है। वे बताते हैं कि प्रधानमंत्री का “खर्च कम करें और लाभ बढ़ाएं” का संदेश उनके लिए प्रेरणास्रोत है। इसी सोच के साथ वे खेत में उपयोग होने वाले अधिकांश संसाधन स्वयं तैयार करते हैं, जिससे उत्पादन लागत काफी कम हो जाती है और लाभ बढ़ता है।
मिट्टी की सेहत पर विशेष ध्यान
अपने खेत की मिट्टी की जांच में कार्बन की मात्रा कम मिलने पर उन्होंने तिल की खेती शुरू की है। फसल की कटाई के बाद उसके अवशेषों को खेत में मिलाकर वे जैविक कार्बन बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता तथा पीएच स्तर संतुलित रखने में मदद मिलती है।
प्रति एकड़ 20 क्विंटल उत्पादन, चिन्नौर चावल 150 रुपये प्रति किलो
खरीफ सीजन में वे मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं और प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त करते हैं। उनके खेत में उत्पादित चिन्नौर चावल शत-प्रतिशत जैविक है जो बाजार में लगभग 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। विभिन्न फसलों एवं कृषि गतिविधियों से उन्हें प्रतिवर्ष 8 लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त होती है। इस कार्य में उनके परिवार के सभी सदस्य सक्रिय रूप से सहयोग करते हैं।
अन्य किसानों के लिए प्रेरणा
दूरस्थ क्षेत्र और कभी माओवाद से प्रभावित रहे ग्राम चिचगांव के प्रगतिशील जैविक किसान श्री ध्रुव ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि खेती को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, स्थानीय संसाधनों और प्राकृतिक पद्धतियों के साथ किया जाए तो कम लागत में भी बेहतर आय प्राप्त की जा सकती है। आज वे अपने क्षेत्र के किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका मानना है कि जैविक खेती ही भारत के किसानों की प्राचीन पारम्परिक उत्कृष्ट कृषि पद्धति है जिसे आने वाले समय में पूरा देश अपनाएगा।