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इजराइल ने किया ईरान का पनडुब्बी ठिकाना तबाह,तेहरान ने अमेरिकी युद्धपोत पर दागी मिसाइल

 तेहरान।पश्चिम एशिया में भड़की जंग अब केवल क्षेत्रीय टकराव नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन को हिला देने वाली निर्णायक भिडंत बन चुकी है। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह बहुस्तरीय जंग हर गुजरते दिन के साथ और अधिक खतरनाक, जटिल और विस्फोटक होती जा रही है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि संयुक्त राष्ट्र तक ने इसे अनियंत्रित तबाही की दहलीज करार दे दिया है।

सबसे ताजा घटनाक्रम में इजरायल ने ईरान के इस्फहान स्थित पनडुब्बी अनुसंधान केंद्र पर सीधा हमला कर दिया। यह वही केंद्र है जहां ईरानी नौसेना के लिए पनडुब्बियों और मानवरहित समुद्री प्रणालियों का विकास होता है। यह हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि ईरान की समुद्री ताकत की रीढ़ तोड़ने की सोची समझी रणनीति है। इसका सीधा संदेश है कि इजरायल अब ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से खत्म करने के मिशन पर उतर चुका है।दूसरी ओर ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है। उसने अमेरिकी युद्धपोत अब्राहम लिंकन पर क्रूज मिसाइलें दागने का दावा किया है। ईरानी नौसेना ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी जहाजी बेड़ा उसकी मारक सीमा में आया तो उसे भारी कीमत चुकानी होगी। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि अब जंग सीधे अमेरिका और ईरान के बीच खुली भिडंत की ओर बढ़ रही है।

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सुरक्षा बैठकों का सिलसिला तेज कर दिया है, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ओर बातचीत की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर सैन्य दबाव बनाए हुए हैं। यह दोहरी रणनीति अमेरिका की पुरानी नीति को उजागर करती है जिसमें बातचीत के नाम पर दबाव और दबाव के नाम पर युद्ध को आगे बढ़ाया जाता है।खाड़ी देशों ने भी ईरान के हमलों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्तित्वगत खतरा बताया है। उनका कहना है कि ईरान की आक्रामकता क्षेत्रीय स्थिरता को खत्म कर रही है। वहीं ईरान का रुख बेहद आक्रामक बना हुआ है। वहां के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कहा है कि देश किसी भी तरह के खतरे की छाया स्वीकार नहीं करेगा और हमलावर को पछताना पड़ेगा।

स्पेन के प्रधानमंत्री ने इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह लेबनान में वही तबाही दोहराना चाहता है जो गाजा में देखी गई थी। इस बयान ने साफ कर दिया है कि यूरोप के भीतर भी इजरायल की रणनीति को लेकर गहरी चिंता है।इस बीच ईरान की संसद के स्पीकर ने अमेरिका को सीधी चेतावनी दी है कि क्षेत्र में उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी जनरल जो गलती कर चुके हैं, उसे सैनिक ठीक नहीं कर पाएंगे। यह बयान युद्ध के मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर ईरान की आक्रामक स्थिति को दर्शाता है।

रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह संघर्ष अब कई स्तरों पर फैल चुका है। एक ओर समुद्री मार्गों विशेषकर होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा दांव पर है, तो दूसरी ओर ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि भारत की तेल कंपनियों ने भरोसा दिलाया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव इस संकट की गंभीरता को दिखाता है।अमेरिका द्वारा प्रस्तावित युद्धविराम योजना, जिसमें प्रतिबंधों में ढील और परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण जैसी शर्तें शामिल हैं, फिलहाल कागजों तक सीमित दिख रही है। ईरान ने साफ इनकार किया है कि कोई बातचीत चल रही है। इसका मतलब है कि कूटनीति अभी कमजोर और युद्ध की भाषा ज्यादा प्रभावी बनी हुई है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह जंग अब प्रॉक्सी से निकलकर प्रत्यक्ष टकराव में बदल रही है। लेबनान में हिज्बुल्ला द्वारा रॉकेट हमले और इजरायल की जवाबी कार्रवाई, इराक में सैन्य ठिकानों पर हमले और अमेरिका की सक्रियता इस बात के संकेत हैं कि पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस सकता है।भारत के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक संतुलन सभी पर इसका असर पड़ सकता है।बहरहाल, यह स्पष्ट है कि यह जंग केवल मिसाइलों और बमों की नहीं, बल्कि रणनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। जो भी पक्ष इस संघर्ष में बढ़त हासिल करेगा, वही आने वाले दशकों तक पश्चिम एशिया की दिशा तय करेगा। लेकिन अगर यह आग इसी तरह भड़कती रही, तो इसका धुआं पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।

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