देश-विदेश
बालेंद्र शाह नेपाल के 47वें प्रधानमंत्री नियुक्त
काठमांडू/नई दिल्ली । नेपाल में राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के संसदीय दल के नेता बालेंद्र शाह को नेपाल का 47वां प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। राष्ट्रपति कार्यालय से शुक्रवार को उनकी नियुक्ति की औपचारिक घोषणा के साथ ही नए मंत्रिमंडल के गठन की प्रक्रिया भी तेज हो गई है।
शाह को प्रतिनिधि सभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता के रूप में संविधान की धारा 76 (1) के तहत यह पद सौंपा गया है। वह काठमांडू महानगर पालिका के मेयर पद से इस्तीफा देकर राजनीति के राष्ट्रीय पटल पर उतरे और लोगों ने उन पर भरोसा जताया।
हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद श्री शाह पहली बार संसद सदस्य के रूप में प्रवेश करते ही देश के कार्यकारी प्रमुख की जिम्मेदारी संभालेंगे। पेशे से इंजीनियर और लोकप्रिय सांस्कृतिक पहचान रखने वाले शाह के नेतृत्व में नेपाल में एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत मानी जा रही है।
इजराइल ने किया ईरान का पनडुब्बी ठिकाना तबाह,तेहरान ने अमेरिकी युद्धपोत पर दागी मिसाइल
तेहरान।पश्चिम एशिया में भड़की जंग अब केवल क्षेत्रीय टकराव नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन को हिला देने वाली निर्णायक भिडंत बन चुकी है। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह बहुस्तरीय जंग हर गुजरते दिन के साथ और अधिक खतरनाक, जटिल और विस्फोटक होती जा रही है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि संयुक्त राष्ट्र तक ने इसे अनियंत्रित तबाही की दहलीज करार दे दिया है।
सबसे ताजा घटनाक्रम में इजरायल ने ईरान के इस्फहान स्थित पनडुब्बी अनुसंधान केंद्र पर सीधा हमला कर दिया। यह वही केंद्र है जहां ईरानी नौसेना के लिए पनडुब्बियों और मानवरहित समुद्री प्रणालियों का विकास होता है। यह हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि ईरान की समुद्री ताकत की रीढ़ तोड़ने की सोची समझी रणनीति है। इसका सीधा संदेश है कि इजरायल अब ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से खत्म करने के मिशन पर उतर चुका है।दूसरी ओर ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है। उसने अमेरिकी युद्धपोत अब्राहम लिंकन पर क्रूज मिसाइलें दागने का दावा किया है। ईरानी नौसेना ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी जहाजी बेड़ा उसकी मारक सीमा में आया तो उसे भारी कीमत चुकानी होगी। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि अब जंग सीधे अमेरिका और ईरान के बीच खुली भिडंत की ओर बढ़ रही है।
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सुरक्षा बैठकों का सिलसिला तेज कर दिया है, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ओर बातचीत की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर सैन्य दबाव बनाए हुए हैं। यह दोहरी रणनीति अमेरिका की पुरानी नीति को उजागर करती है जिसमें बातचीत के नाम पर दबाव और दबाव के नाम पर युद्ध को आगे बढ़ाया जाता है।खाड़ी देशों ने भी ईरान के हमलों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्तित्वगत खतरा बताया है। उनका कहना है कि ईरान की आक्रामकता क्षेत्रीय स्थिरता को खत्म कर रही है। वहीं ईरान का रुख बेहद आक्रामक बना हुआ है। वहां के शीर्ष नेतृत्व ने साफ कहा है कि देश किसी भी तरह के खतरे की छाया स्वीकार नहीं करेगा और हमलावर को पछताना पड़ेगा।
स्पेन के प्रधानमंत्री ने इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह लेबनान में वही तबाही दोहराना चाहता है जो गाजा में देखी गई थी। इस बयान ने साफ कर दिया है कि यूरोप के भीतर भी इजरायल की रणनीति को लेकर गहरी चिंता है।इस बीच ईरान की संसद के स्पीकर ने अमेरिका को सीधी चेतावनी दी है कि क्षेत्र में उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी जनरल जो गलती कर चुके हैं, उसे सैनिक ठीक नहीं कर पाएंगे। यह बयान युद्ध के मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर ईरान की आक्रामक स्थिति को दर्शाता है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह संघर्ष अब कई स्तरों पर फैल चुका है। एक ओर समुद्री मार्गों विशेषकर होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा दांव पर है, तो दूसरी ओर ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि भारत की तेल कंपनियों ने भरोसा दिलाया है कि देश में ईंधन की कोई कमी नहीं है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी उतार चढ़ाव इस संकट की गंभीरता को दिखाता है।अमेरिका द्वारा प्रस्तावित युद्धविराम योजना, जिसमें प्रतिबंधों में ढील और परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण जैसी शर्तें शामिल हैं, फिलहाल कागजों तक सीमित दिख रही है। ईरान ने साफ इनकार किया है कि कोई बातचीत चल रही है। इसका मतलब है कि कूटनीति अभी कमजोर और युद्ध की भाषा ज्यादा प्रभावी बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह जंग अब प्रॉक्सी से निकलकर प्रत्यक्ष टकराव में बदल रही है। लेबनान में हिज्बुल्ला द्वारा रॉकेट हमले और इजरायल की जवाबी कार्रवाई, इराक में सैन्य ठिकानों पर हमले और अमेरिका की सक्रियता इस बात के संकेत हैं कि पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस सकता है।भारत के लिए भी यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक संतुलन सभी पर इसका असर पड़ सकता है।बहरहाल, यह स्पष्ट है कि यह जंग केवल मिसाइलों और बमों की नहीं, बल्कि रणनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। जो भी पक्ष इस संघर्ष में बढ़त हासिल करेगा, वही आने वाले दशकों तक पश्चिम एशिया की दिशा तय करेगा। लेकिन अगर यह आग इसी तरह भड़कती रही, तो इसका धुआं पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।
ईरान जंग में अपने घर में ही 'हार' गए ट्रंप, गिर गई लोकप्रियता, सर्वे ने उड़ाए होश!
वाशि्ंगटन। लगभग 25% लोगों ने कहा कि वे ट्रम्प द्वारा जीवन यापन की लागत को नियंत्रित करने के तरीके से संतुष्ट हैं। उनके आर्थिक नेतृत्व पर भी भरोसा कम है, केवल 29% लोगों ने ही उन्हें समर्थन दिया है। यह रेटिंग जो बाइडेन के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान देखी गई रेटिंग से भी कम है, जो इस बात को रेखांकित करती है कि मतदाताओं के लिए आर्थिक चिंताएं कितनी गंभीर हो गई हैं।
हाल ही में हुए रॉयटर्स/इप्सोस सर्वेक्षण के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता में उल्लेखनीय गिरावट आई है। सर्वेक्षण से पता चलता है कि केवल 36% अमेरिकी ही उनके प्रदर्शन से संतुष्ट हैं, जबकि एक सप्ताह पहले यह आंकड़ा 40% था। सत्ता में वापसी के बाद से उनकी लोकप्रियता में यह सबसे निचले स्तरों में से एक है। इस गिरावट का एक प्रमुख कारण अर्थव्यवस्था को लेकर बढ़ती असंतुष्टि प्रतीत होती है। ईंधन की बढ़ती कीमतें कई अमेरिकियों के लिए एक प्रमुख मुद्दा बन गई हैं। केवल लगभग 25% लोगों ने कहा कि वे ट्रम्प द्वारा जीवन यापन की लागत को नियंत्रित करने के तरीके से संतुष्ट हैं। उनके
ईरान के साथ जारी संघर्ष जनमत को प्रभावित करने वाला एक अन्य कारक है। अमेरिकी सैन्य हमलों के समर्थन में थोड़ी गिरावट आई है, अब केवल 35% लोग ही इसके पक्ष में हैं, जबकि बहुमत (61%) इसके खिलाफ है। कई अमेरिकी दीर्घकालिक परिणामों को लेकर भी चिंतित हैं। सर्वेक्षण में शामिल लगभग आधे लोगों का मानना है कि यह संघर्ष भविष्य में संयुक्त राज्य अमेरिका को कम सुरक्षित बना सकता है, जबकि केवल एक छोटा हिस्सा ही मानता है कि इससे सुरक्षा में सुधार होगा।
संघर्ष की शुरुआत से ही अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लगभग एक डॉलर प्रति गैलन की बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईंधन की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका समग्र अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के खर्चों पर और भी अधिक प्रभाव पड़ सकता है। कुल मिलाकर गिरावट के बावजूद, ट्रंप को अपने रिपब्लिकन समर्थकों से मजबूत समर्थन मिल रहा है। हालांकि, उनकी पार्टी के भीतर भी, बढ़ती महंगाई को लेकर चिंता बढ़ रही है। पहले के सर्वेक्षणों की तुलना में अब अधिक संख्या में रिपब्लिकन मतदाता असंतोष व्यक्त कर रहे हैं। लोकप्रियता रेटिंग में गिरावट का असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है। हालांकि डेमोक्रेट इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक कोई स्पष्ट बढ़त हासिल नहीं हुई है। आर्थिक मुद्दों पर, मतदाताओं के बीच रिपब्लिकन अभी भी मामूली बढ़त बनाए हुए हैं।
ईरान ने भारत समेत पांच मित्र देशों को होर्मुज जलमार्ग से आने-जाने की दी अनुमति
तेहरान । पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच ईरान ने ऐलान किया है कि वह भारत समेत पांच मित्र देशों से संबंधित जहाजों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, जिससे उन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति मिल जाएगी, जबकि अन्य देशों के लिए पहुंच सीमित रहेगी। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बावजूद भारत के साथ-साथ रूस, चीन, पाकिस्तान और इराक के जहाजों को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से सुरक्षित मार्ग प्रदान किया गया है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ईरानी सरकारी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद नहीं किया गया है और कुछ ऐसे देशों को प्रतिबंधों से छूट दी गई हैm जिनके साथ ईरान के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं।
ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी के अनुसार, अराघची ने कहा, शत्रु को जलडमरूमध्य से गुजरने देने का कोई कारण नहीं है। हमने कुछ ऐसे देशों को गुजरने की अनुमति दी है, जिन्हें हम मित्र मानते हैं। हमने चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान को आने-जाने की अनुमति दी है।
साथ ही, उन्होंने संकेत दिया कि जिन देशों को शत्रु माना जाता है या जो मौजूदा संघर्ष में शामिल हैं, उनसे जुड़े जहाजों को जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल और कुछ खाड़ी देशों के जहाज, जो वर्तमान संकट में भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
अराघची ने महत्वपूर्ण जलमार्ग पर ईरान के नियंत्रण पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि देश ने दशकों बाद इस क्षेत्र में अपना अधिकार प्रदर्शित किया है।
उन्होंने कहा कि जब ईरान ने शुरू में होर्मुज जलडमरूमध्य की आंशिक नाकाबंदी की घोषणा की थी तो कई पर्यवेक्षकों ने इसे एक दिखावा मानकर खारिज कर दिया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि बाद के घटनाक्रमों ने ईरान की अपनी स्थिति को लागू करने और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा पारगमन मार्गों में से एक पर नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता को रेखांकित किया है।
अमेरिका ने ईरान को युद्ध खत्म करने के लिए 15-सूत्रीय प्लान भेजा
वाशिंगटन । अमेरिका ने ईरान को युद्ध खत्म करने और उसके परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के लिए एक व्यापक 15-सूत्रीय प्लान भेजा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान समझौता करना चाहता है। यह प्रस्ताव मध्यस्थों के माध्यम भेजा गया है। इसमें लड़ाई रोकने, ईरान की परमाणु गतिविधियों पर रोक लगाने और क्षेत्र में नया रूप देने के लिए एक व्यापक रूपरेखा तैयार की गई है। यह जानकारी द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अधिकारियों के हवाले से दी है। प्लान में कहा गया है कि ईरान अपने तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों को बंद करे, अपने देश में यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोक दे और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को भी निलंबित कर दे। साथ ही, ईरान द्वारा प्रॉक्सी समूहों को दी जा रही मदद पर भी रोक लगाने और होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह खोलने की बात कही गई है।
इस योजना में एक महीने के युद्धविराम का प्रस्ताव भी है। इसमें ईरान से यह वादा करने को कहा गया है कि वह कभी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं करेगा। साथ ही, उसे अपने पास मौजूद संवर्धित परमाणु सामग्री को तय समय के भीतर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को सौंपना होगा।
इसमें नतान्ज, इस्फहान और फ़ोर्डो परमाणु ठिकानों को सेवा से बाहर करने और उन्हें नष्ट करने का भी आह्वान किया गया है, साथ ही संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानी निकाय को ईरान के भीतर की जानकारी तक पूरी पहुंच प्रदान करने की बात कही गई है।
क्षेत्रीय स्तर पर ईरान से कहा गया है कि वह अपने सहयोगी समूहों को समर्थन देना बंद करे और उन्हें धन या हथियार न दे। इसके अलावा, होर्मुज स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ते के रूप में खुला रखने की बात भी शामिल है।
मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर बाद में चर्चा करने की बात कही गई है, जिसमें मिसाइलों की संख्या और उनकी मारक क्षमता पर सीमा तय की जा सकती है। साथ ही, ईरान की सैन्य ताकत को केवल आत्मरक्षा तक सीमित रखने का प्रस्ताव भी है।
इसके बदले में ईरान पर लगे सभी परमाणु से जुड़े प्रतिबंध हटाने की बात कही गई है। अमेरिका, बुशहर में एक नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विकास में मदद करने को भी तैयार है, जिससे बिजली बनाई जा सकेगी, लेकिन इस पर निगरानी रखी जाएगी।
इस प्रस्ताव में "स्नैपबैक" सिस्टम को समाप्त करने का प्रावधान भी शामिल है, जो प्रतिबंधों को स्वचालित रूप से फिर से लागू करने की अनुमति देता है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, यह योजना काफी हद तक ट्रंप सरकार की पहले की मांगों जैसी है, जो 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने से पहले रखी गई थीं।
वॉल स्ट्रीट जर्नल और न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह योजना बिचौलियों के जरिए पहुंचाई गई है। इस कूटनीतिक कोशिश में पाकिस्तान एक अहम कड़ी बनकर उभरा है, साथ ही तुर्की और मिस्र भी इसमें शामिल हैं, जो अमेरिका और ईरान के अधिकारियों के बीच बातचीत करवाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, बातचीत की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच अभी भी बड़ा अंतर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने इजरायल, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब समेत कई जगहों पर हमले जारी रखे हैं।
अमेरिका ने मध्य पूर्व के लिए 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के सैनिकों को किया तैयार
वॉशिंगटन । पेंटागन अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की तैयारी कर रहा है, जो ईरान संघर्ष में संभावित बढ़ोतरी का संकेत देता है। हालांकि वॉशिंगटन अभी भी कूटनीतिक विकल्पों की तलाश कर रहा है। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 3,000 सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करने की तैयारी की जा रही है, जिससे पहले से ही क्षेत्र की ओर जा रहे हजारों मरीन सैनिकों की संख्या में इजाफा होगा। अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों को ईरान में प्रवेश करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। हालांकि, सैन्य जमावड़ा इस संभावना को बढ़ाता है कि अमेरिकी बल इस संघर्ष में और गहराई तक शामिल हो सकते हैं।
सीबीएस न्यूज की एक अलग रिपोर्ट में कहा गया है कि 82वीं एयरबोर्न के कुछ हिस्सों जिसमें कमांड इकाइयां और जमीनी बल शामिल हैं, को तैनात किए जाने की उम्मीद है। एक अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिया कि शुरुआती दल 1,500 से कम सैनिकों का हो सकता है।
82वीं एयरबोर्न अमेरिकी सेना की प्रमुख त्वरित-प्रतिक्रिया इकाइयों में से एक है। यह कुछ ही घंटों में दुनियाभर में तैनात हो सकती है। द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, इसकी “इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स” 18 घंटों के भीतर मूव कर सकती है, जिससे व्हाइट हाउस को लचीले सैन्य विकल्प मिलते हैं।
यह सैनिकों की तैनाती ऐसे समय हो रही है जब युद्ध अपने चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। अब तक अमेरिका ने मुख्य रूप से लड़ाकू विमानों, बमवर्षकों और ड्रोन का उपयोग करते हुए हवाई अभियान पर निर्भर किया है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, फरवरी के अंत से ईरान के भीतर 9,000 से अधिक सैन्य ठिकानों पर हमले किए जा चुके हैं। इनमें मिसाइल लॉन्चर, नौसैनिक संसाधन और रक्षा औद्योगिक सुविधाएं शामिल हैं।
क्षेत्र में लड़ाई जारी है। ईरान ने इज़राइल और अन्य देशों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए हैं जबकि वॉशिंगटन बातचीत के लिए खुलापन दिखा रहा है।
मेलानिया ट्रंप के टेक अलायंस में शामिल हुए 45 देश
वाशिंगटन । अमेरिका की 'फर्स्ट लेडी' मेलानिया ट्रंप ने 45 देशों और बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को एक साथ लाने वाला एक नया वैश्विक गठबंधन किया है। इसका उद्देश्य दुनियाभर के बच्चों के लिए शिक्षा और तकनीक तक पहुंच बढ़ाने के लिए समन्वित प्रयास करना है। अमेरिकी विदेश विभाग में आयोजित 'फोस्टरिंग द फ्यूचर टुगेदर' शिखर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, एक इंसान के तौर पर हम सपने देखते हैं। लीडर के तौर पर हम आगे बढ़ते हैं। एक राष्ट्र के रूप में हम निर्माण करते हैं। आज से, आइए अपने नए ग्लोबल अलायंस को गति दें, ताकि हमारे बच्चों के विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। दो दिवसीय इस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय नेता और बड़ी टेक कंपनियां एक साथ आई हैं, ताकि डिजिटल माहौल में बच्चों के लिए शैक्षणिक संसाधनों को बढ़ाने और सुरक्षा को मजबूत करने पर मिलकर काम किया जा सके।
मेलानिया ट्रंप ने कहा, हमारे गठबंधन का मिशन बच्चों को तकनीक और शिक्षा तक ज्यादा पहुंच देकर उन्हें सशक्त बनाना है। यह एक ऐतिहासिक क्षण है। अपने भाषण में 'फर्स्ट लेडी' ने एक रोडमैप भी पेश किया, जिसमें नवाचार आधारित शिक्षण कार्यक्रम विकसित करना, शिक्षा के लिए सहायक नीतियों की वकालत करना, तकनीक आधारित कानूनों को प्रोत्साहित करना और सरकारों व निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को मजबूत करना शामिल है।
उन्होंने कहा, हमारा साझा दृष्टिकोण बच्चों को राजनीति, भौगोलिक सीमाओं और स्थानीय पूर्वाग्रहों से ऊपर रखता है, और सभी सदस्य देशों से क्षेत्रीय बैठक आयोजित करने, शोध अध्ययन करने, नई साझेदारियां बढ़ाने और अन्य देशों के साथ सहयोग करने” का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हमारा कॉमन विजन बच्चों को राजनीति, भौगोलिक सीमाओं और स्थानीय पूर्वाग्रहों से ऊपर रखता है।
ईरान ने क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा, युद्ध खत्म करने के लिए दोहराई शर्तें
तेहरान । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने पश्चिम एशिया में बिना किसी विदेशी दखल के शांति, सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र के देशों को मिलाकर एक सुरक्षा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उन्होंने चल रहे युद्ध को खत्म करने की शर्तें दोहराईं। ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी आईआरएनए के हवाले से न्यूज एजेंसी सिन्हुआ ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक फोन कॉल में यह बात कही, जिसमें दोनों पक्षों ने आपसी संबंधों के साथ-साथ ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद हुए नए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर भी चर्चा की। रिपोर्ट में कहा गया है कि पेजेश्कियन ने कहा कि युद्ध खत्म करने के लिए ईरान की पहली शर्त अमेरिका और इजरायल के हमलों को तुरंत रोकना और यह गारंटी देना है कि भविष्य में ऐसे हमले दोबारा नहीं होंगे।
उन्होंने ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, बड़े सैन्य कमांडरों और आम लोगों की हत्या करने और देश के पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने के लिए अमेरिका और इजरायल की कड़ी निंदा की।
बीते दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि युद्ध का मकसद देश को न्यूक्लियर हथियार बनाने से रोकना है। हालांकि, पेजेश्कियन ने अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों को खारिज कर और इस बात पर जोर दिया कि ईरान के पूर्व नेता परमाणु हथियार बनाने के सख्त खिलाफ थे और उन्होंने इस तरह की किसी भी कोशिश को रोकने के लिए जरूरी आदेश जारी किए थे।
वहीं इस बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर "गहरी चिंता" जताई, इलाके के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर किसी भी हमले की कड़ी निंदा की और होर्मुज स्ट्रेट में सुरक्षा और खाड़ी में नेविगेशन की आजादी सुनिश्चित करने की अपील की।
बता दें, 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका ने तेहरान और ईरान के कई दूसरे शहरों पर मिलकर हमले किए, जिसमें अली खामेनेई के साथ-साथ वरिष्ठ ईरानी सैन्य कमांडर और आम लोग मारे गए। ईरान ने जवाब में मिसाइल और ड्रोन हमलों की झड़ी लगा दी, जिनसे इजरायल और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी बेस और संपत्तियों को निशाना बनाया गया।
टेक्सास से एलपीजी लेकर आ रहा जहाज भारत पहुंचा
नई दिल्ली । दुनिया भर में सामान की सप्लाई में आ रही दिक्कतों के बीच, अमेरिका से द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) लेकर एक बड़ा जहाज़ भारत के मंगलुरु बंदरगाह पर पहुंच गया है। अमेरिका के टेक्सास राज्य से एलपीजी लेकर आ रहा मालवाहक जहाज पाइक्सिस पायनियर बंदरगाह पर पहुंच गया है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस से कच्चा तेल ले जा रहा एक अन्य जहाज भी मंगलुरु पहुंच गया है। यह जहाज बंदरगाह से लगभग 18 समुद्री मील दूर स्थित था। तेल को पाइपलाइन के माध्यम से एमआरपीएल तक पहुंचाने के लिए सिंगल-पॉइंट मूरिंग सिस्टम का उपयोग किया जाएगा।
रूस से आया यह कच्चा तेल अमेरिका की ओर से जारी किए गए अस्थायी सामान्य लाइसेंस के बाद पहुंचा है, जिससे 12 मार्च से समुद्र में फंसे रूसी कच्चे तेल की बिक्री की अनुमति मिली है। मध्य पूर्व में तनाव के बीच वैश्विक ईंधन कीमतों को स्थिर करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने यह कदम उठाया गया है।
अमेरिका से मिली अनुमति के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में भारी बढ़ोतरी की है। ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति में आई बाधाओं के बाद आपूर्ति संबंधी चिंताओं को दूर करने के उद्देश्य से भारत ने कच्चे तेल की खरीद में बढ़ोत्तरी की है।
इससे पहले, 'नंदा देवी' और 'शिवालिक' जहाज भी एलपीजी लेकर भारत आए थे। नंदा देवी जहाज गुजरात के वडीनार बंदरगाह पर पहुंचा था और शिवालिक मुंद्रा बंदरगाह पर पहुंचा था। दोनों जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर बेहद जोखिम भरे रास्ते से गुजरते हुए एलपीजी लेकर आए थे। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष के कारण समुद्री रास्ता बाधित है।
पश्चिमी फारस की खाड़ी क्षेत्र में कुल 22 भारतीय ध्वज वाले जहाज और 611 भारतीय नाविक मौजूद हैं और डीजी शिपिंग जहाज मालिकों, आरपीएसएल एजेंसियों और भारतीय मिशनों के समन्वय से स्थिति पर नजर रख रहा है।
पीएम मोदी ने जल संरक्षण का संकल्प दोहराने की अपील की
नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व जल दिवस के अवसर पर देशवासियों से जल संरक्षण का संकल्प दोहराने की अपील करते हुए कहा कि पानी न सिर्फ जीवन का आधार है, बल्कि हमारे ग्रह के भविष्य को भी आकार देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट किया, जल हमें जीवन देता है और हमारे ग्रह के भविष्य को आकार देता है। विश्व जल दिवस के अवसर पर, आइए हम जल की हर बूंद को बचाने और उसका जिम्मेदारी से उपयोग करने के अपने संकल्प को दोहराएं। आज उन लोगों की सराहना करने का भी दिन है, जो सतत उपायों को अपनाते हैं, जागरूकता फैलाते हैं और संरक्षण की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। इस अवसर पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने 'एक्स' पोस्ट में लिखा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में देश में जल प्रबंधन, संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। आज जल संरक्षण जनभागीदारी से प्रेरित एक सशक्त राष्ट्रीय अभियान का रूप ले चुका है, जहां नीतियों के साथ-साथ समाज की सक्रिय जन भागीदारी इस दिशा में नई ऊर्जा प्रदान कर रही है।
उन्होंने आगे लिखा, स्वच्छ पेयजल की बेहतर उपलब्धता ने अनेक क्षेत्रों में महिलाओं के श्रम को कम किया है, जिससे उनके जीवन में गरिमा और सुविधा का विस्तार हुआ है। साथ ही, बच्चों के स्वास्थ्य और स्वच्छता में भी सकारात्मक सुधार परिलक्षित हो रहा है, जो एक स्वस्थ समाज की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है। जल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन और सतत उपयोग की दिशा में देश निरंतर अग्रसर है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने का आधार बन रहा है।
उन्होंने नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि वे जल के महत्व को समझते हुए उसके संरक्षण को अपने व्यवहार और जीवनशैली का स्वाभाविक हिस्सा बनाएं। विश्व जल दिवस के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पोस्ट किया, आइए हम जल संरक्षण, सतत विकास को बढ़ावा देने और सभ्यता की इस जीवन-रेखा की रक्षा करने के अपने संकल्प को दोहराएं, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेशवासियों को विश्व जल दिवस की शुभकामनाएं देते हुए 'एक्स' पोस्ट में कहा, उत्तराखंड में जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का आधार है। हमारी नदियां, हमारे नौले-धारे और प्राकृतिक जल स्रोत हमारी समृद्ध परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
उन्होंने कहा, प्रदेश सरकार की ओर से स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी के माध्यम से सूखते जल स्रोतों और नदियों के पुनर्जीवन का व्यापक अभियान चलाया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और हमारे पारंपरिक जल स्रोत पुनः जीवंत हो सकें। आइए, हम सभी जल संरक्षण का संकल्प लें और जल बचाकर अपने भविष्य को सुरक्षित बनाएं।
अजमेर के पूर्व सांसद विष्णु मोदी का निधन
जयपुर। वैश्य समाज की राजनीति के दिग्गज स्तंभ और अजमेर के पूर्व सांसद विष्णु मोदी का जयपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 1984 में अजमेर से लोकसभा सांसद रहे थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर फैलते ही वैश्य में शोक की लहर दौड़ गई है। अग्रवाल वैश्य समाज हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक बुवानीवाला ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
बुवानीवाला ने कहा कि मोदी ने सार्वजनिक सेवा की विरासत को बखूबी आगे बढ़ाया।उन्होंने 1984 में अजमेर लोकसभा सीट से भारी बहुमत से चुनाव जीता और 8वीं लोकसभा के सदस्य के रूप में दिल्ली पहुंचे। उन्होंने कहा कि मोदी दो बार राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने 1993 से 1998 तक पुष्कर और 2003 से 2008 तक मसूदा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। विष्णु मोदी की जड़ें राजस्थान की मिट्टी और राजनीति में बहुत गहरी थीं।
अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन के संस्थापक अध्यक्ष एवं 1971 से 1977 तक सीकर से सांसद किशन मोदी के सुपुत्र विष्णु मोदी के चाचा मोहन लाल मोदी नीमकाथाना (सीकर) से पांच बार विधायक रहे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मोदी परिवार का राजस्थान की सेवा में दशकों का योगदान रहा है। विष्णु मोदी को केवल एक नेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक विजनरी शिक्षाविद् के रूप में भी याद किया जाएगा। उन्होंने 2001 में मोदी शिक्षण संस्थान के माध्यम से नीरजा मोदी स्कूल की स्थापना की।
भारत विद्युत शिखर सम्मेलन 2026 में छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण सहभागिता।
वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की भारत की महत्वाकांक्षी यात्रा में भारत की विद्युत क्षेत्र के विकास को गति देने के उद्देश्य से दिनांक 19 से 22 मार्च 2026 को नई दिल्ली में भारत विद्युत शिखर सम्मेलन 2026 का आयोजन किया जा रहा है।
पोलैंड ने सुरक्षा चिंताओं के बीच इराक से अपने सैनिकों को वापस बुलाया
वारसॉ । मध्य पूर्व में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के बीच पोलैंड ने इराक से अपने सैनिकों को वापस बुला लिया है। रक्षा मंत्री व्लादिस्लाव कोसिनियाक कामिश ने इसकी घोषणा की। यह निर्णय परिचालन स्थितियों और संभावित जोखिमों के आकलन के बाद लिया गया। कोसिनियाक कामिश ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में यह जानकारी दी। शिन्हुआ के अनुसार, पोलिश प्रेस एजेंसी के हवाले से इराक में अधिकतम 350 पोलिश सैनिक तैनात थे। इस दल को जॉर्डन, कतर और कुवैत में भी संचालन की अनुमति थी।
कोसिनियाक कामिश ने आगे बताया कि अधिकांश कर्मी पहले ही पोलैंड लौट चुके हैं या वापस आने के रास्ते में हैं जबकि कुछ को अपना मिशन जारी रखने के लिए जॉर्डन स्थानांतरित किया गया है। इस बीच, इराक में नाटो मिशन ने भी सुरक्षा चिंताओं के कारण अपने कर्मियों की अस्थायी वापसी शुरू कर दी है। एक वरिष्ठ सुरक्षा स्रोत ने शुक्रवार को इराकी न्यूज़ एजेंसी (आईएनए) को यह जानकारी दी।
सूत्र ने इस कदम को जारी संघर्ष और मिशन सदस्यों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के कारण उठाया गया अस्थायी उपाय बताया। आईएनए के अनुसार युद्ध समाप्त होने और इराक में सुरक्षा स्थिति स्थिर होने पर वे वापस लौट आएंगे। गैर-लड़ाकू सलाहकार नाटो मिशन इराक 2018 में इराकी सरकार के अनुरोध पर स्थापित किया गया था, ताकि उसके सुरक्षा क्षेत्र को मजबूत किया जा सके।
यह अस्थायी वापसी 28 फरवरी को तेहरान और ईरान के कई अन्य शहरों पर इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए संयुक्त हमलों के बाद बढ़े तनाव के बीच हुई, जिसमें ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता सहित वरिष्ठ सैन्य कमांडरों और नागरिकों की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने मध्य पूर्व में इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों तथा संपत्तियों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों की कई लहरें शुरू कीं।
ईरान की यूएस-इजराइल को सीधी चेतावनी, 'हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर पर अटैक हुआ तो और हमले झेलोगे
तेहरान।ईरान के प्रवक्ता ने कहा कि हमारे बुनियादी ढांचे पर हमला करो, और हम तुम्हारे और भी महत्वपूर्ण और असंख्य बुनियादी ढांचे पर हमला करेंगे। हम शक्तिशाली हैं और ईश्वर की कृपा से शक्तिशाली बने रहेंगे।' उन्होंने ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया को और तेज़ करने की तत्परता को रेखांकित किया। उन्होंने आगे कहा कि ईरान न केवल अपनी रक्षा कर रहा है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापक मुस्लिम जगत के हित में भी कार्य कर रहा है।
ईरान ने शनिवार को अमेरिका और इज़राइल को कड़ी चेतावनी जारी करते हुए कहा कि क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के बीच, ईरान अपने बुनियादी ढांचे पर किसी भी हमले का व्यापक जवाबी हमले करेगा। यह जानकारी ईरान की सरकारी मीडिया तसनीम न्यूज़ एजेंसी ने दी। केंद्रीय खातम अल-अनबिया मुख्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि अगर आक्रामकता जारी रही तो ईरान के सशस्त्र बल अपनी प्रतिक्रिया को और तेज़ करने के लिए तैयार हैं। तसनीम न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, प्रवक्ता ने कहा कि हमारे बुनियादी ढांचे पर हमला करो, और हम तुम्हारे और भी महत्वपूर्ण और असंख्य बुनियादी ढांचे पर हमला करेंगे। हम शक्तिशाली हैं और ईश्वर की कृपा से शक्तिशाली बने रहेंगे।" उन्होंने ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया को और तेज़ करने की तत्परता को रेखांकित किया। उन्होंने आगे कहा कि ईरान न केवल अपनी रक्षा कर रहा है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापक मुस्लिम जगत के हित में भी कार्य कर रहा है।
तसनीम समाचार एजेंसी के अनुसार, प्रवक्ता ने कहा, "ईरान न केवल अपनी रक्षा के लिए लड़ रहा है, बल्कि क्षेत्र और मुसलमानों की सुरक्षा के लिए भी लड़ रहा है। केंद्रीय खातम अल-अनबिया मुख्यालय ईरान की सर्वोच्च परिचालन कमान इकाई है जो सेना और इस्लामिक क्रांति रक्षक कोर (आईआरजीसी) के बीच अभियानों का समन्वय करती है। रणनीतिक जलमार्गों पर प्रकाश डालते हुए, प्रवक्ता ने महत्वपूर्ण वैश्विक ऊर्जा पारगमन मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की ताकत पर जोर दिया, जो मौजूदा संघर्ष में इसके महत्व को दर्शाता है। प्रवक्ता ने आगे चेतावनी दी कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है और कहा कि दुश्मनों का मुकाबला करने का रास्ता प्रतिरोध में निहित है।
तस्मीन समाचार एजेंसी के अनुसार, उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान अपनी महानता दिखा रहा है। हमने आपकी हार का रास्ता जान लिया है, और वह है प्रतिरोध। दुश्मन जानते हैं कि युद्ध जारी रखने का मतलब है उनके तबाह ठिकानों पर एक और तबाही, जिसका पुनर्निर्माण संभव नहीं होगा। ईरान के रुख की पुष्टि करते हुए प्रवक्ता ने कहा कि यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक देश के खिलाफ खतरे समाप्त नहीं हो जाते।उन्होंने कहा कि यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक अपराधियों के एजेंडे से इस भूमि पर आक्रमण का विकल्प हटा नहीं दिया जाता।" उन्होंने आगे कहा कि आगे के हमलों की स्थिति में ईरान के सशस्त्र बल अपनी जवाबी कार्रवाई का दायरा बढ़ाएंगे।
नतांज स्थित परमाणु संवर्धन केंद्र पर हमले का ईरान ने दिया करारा जवाब
तेहरान।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू ईरान का परमाणु भंडार है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान के पास साठ प्रतिशत तक संवर्धित करीब चार सौ पचास किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है। अमेरिका इस सामग्री को कब्जे में लेने की रणनीति बना रहा है, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है।
ईरान के परमाणु केंद्रों पर हुए ताजा हमले ने पश्चिम एशिया को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है। नतांज स्थित परमाणु संवर्धन केंद्र पर अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले ने यह साफ कर दिया है कि यह संघर्ष अब खुली टकराहट में बदल चुका है। हालात इतने विस्फोटक हो चुके हैं कि दुनिया तीसरे वैश्विक संकट की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है। आज हुए इस हमले के बाद ईरान ने भी जवाबी वार में कोई देर नहीं की। तेहरान ने इजराइल के बेन गुरियन हवाई अड्डे पर ईंधन टैंकों को निशाना बनाकर यह संदेश दे दिया कि वह झुकने वाला नहीं है। इतना ही नहीं, ईरान ने हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य ठिकाने पर बैलिस्टिक मिसाइल दागकर अमेरिका और ब्रिटेन को सीधी चुनौती दे डाली। भले ही ये मिसाइल अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन उनका संदेश बेहद स्पष्ट था।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू ईरान का परमाणु भंडार है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान के पास साठ प्रतिशत तक संवर्धित करीब चार सौ पचास किलोग्राम यूरेनियम मौजूद है। अमेरिका इस सामग्री को कब्जे में लेने की रणनीति बना रहा है, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। अगर यह सामग्री किसी भी तरह युद्ध के बीच इजराइल ने तेहरान, इस्फहान और कराज जैसे प्रमुख शहरों पर ताजा हवाई हमले कर ईरान के भीतर गहराई तक घुसपैठ की है। दूसरी ओर लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर भी हमले तेज कर दिए गए हैं। इस युद्ध ने अब कई मोर्चे खोल दिए हैं, जिससे पूरा क्षेत्र अस्थिरता के भंवर में फंस गया है।
युद्ध का आर्थिक प्रभाव भी तेजी से सामने आ रहा है। अमेरिका ने तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है। इसी के चलते भारत और एशिया के कई देश फिर से ईरान से तेल खरीदने की तैयारी में हैं। भारतीय रिफाइनरियां सरकार के निर्देश का इंतजार कर रही हैं। यह स्थिति साफ बताती है कि युद्ध केवल सैन्य नहीं बल्कि ऊर्जा और अर्थव्यवस्था का भी खेल बन चुका है।
ईरान की तबाही में अमेरिका 12 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर चुका
वाशिंगटन।ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल की जंग 15 दिन से ज्यादा समय से चल रही है। ईरान ने स्टेट ऑफ हरमूज पर नाकेबंदी कर पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया था। यह अलग बात है कि उसने अमेरिका और इजराइल के साथ-साथ युद्ध में उसके सहयोगी देशों को छोड़कर बाकी देशों के लिए होरमूज का रास्ता खोल दिया है। जाहिर है इससे दूसरे देशों को बहुत कम आर्थिक नुकसान होगा। वैसे यह बात बार-बार सामने आती रही है कि युद्ध सिर्फ विनाश और तबाही लाता है। इससे किसी का भला नहीं होता। नुकसान ही होता है। कभी सोचा है आपने कि ट्रंप की सनक पर ईरान पर हमला करते हुए अमेरिका अब तक कितने पैसे गवा चुका होगा? पैसे का तो जो नुकसान अमेरिका को हो रहा है, सो हो ही रहा है। उसने अब तक कम से कम अपने 11 सैनिक खो दिए। युद्ध के दौरान फ्यूल भरने वाले पांच विमान भी उसके क्रैश हो चुके हैं। इन सब के अलावा वह तेहरान से लेकर इसफानम तक भी B52 बमबर से लगातार बम बरसा रहा है।
इस बमबारी से ईरान तो तबाह है ही लेकिन तबाही मचाने में अमेरिका ने कितने रुपए बहा दिए? इसका अंदाजा है आपको? अमेरिका राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैट ने यह जानकारी साझा की। ईरान के साथ जारी युद्ध पर अमेरिका अब तक लगभग 12 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर चुका है। यह बात राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के निदेशक केविन हैसेट ने कही। वह सीबीएस न्यूज के फेस द नेशन कार्यक्रम में बोल रहे थे। हैसेट ने कहा कि मुझे जो नवीनतम संख्या बताई गई है, वह 12 (अरब अमेरिकी डॉलर) है। यह पूछे जाने पर कि क्या अमेरिका को कांग्रेस (अमेरिकी संसद) से और अधिक धन का अनुरोध करने की आवश्यकता होगी, हैसेट ने जवाब दिया मुझे लगता है कि अभी हमारे पास वह सबकुछ है जिसकी हमें आवश्यकता है, क्या हमें और अधिक धन के लिए कांग्रेस के पास वापस जाना होगा, यह एक ऐसा विषय है जिसकी पड़ताल रसेल वॉट और ओएमबी करेंगे। ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट कार्यालय है तथा रसेल वॉट इसके निदेशक हैं।
बता दें कि ओएमबी अमेरिका का प्रबंधन और बजट ऑफिस है और रसेल वाट इसके डायरेक्टर हैं। लेकिन इस खर्च और तबाही के हिसाब के बाद भी यह सवाल बचा रह जाता है कि इन सबका हासिल क्या है? शांति दूत बनने की चाह में अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप कब अशांति के दूत बन गए? इसका एहसास उन्हें आखिर कब होगा? इंसानियत की हत्या करने वाली यह जंग आखिर कब तक चलेगी?
नई दिल्ली में सशक्त पंचायत नेत्री अभियान का राष्ट्रीय सम्मेलन, फुलकर्रा की सरपंच चुड़ामणि दीवान ने बढ़ाया गरियाबंद का मान
राधेश्याम सोनवानी,
गरियाबंद :-नई दिल्ली में भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय द्वारा आयोजित “सशक्त पंचायत नेत्री अभियान” के राष्ट्रीय सम्मेलन में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से चयनित महिला सरपंचों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत फुलकर्रा की सरपंच चूड़ामणि दीवान भी शामिल हुईं और राष्ट्रीय मंच पर जिले का मान बढ़ाया।